'वसुमत्-हिरण्यवत्-अश्वावत्-गोमत्-यवमत्'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = सोम! तू (नः) = हमारे लिये (सुवीर्यम्) = उत्तम शक्ति को आपवस्व प्राप्त करा । जो शक्ति (वसुमत्) = उत्तम वसुओंवाली है, निवास को उत्तम बनानेवाले सब आवश्यक तत्त्वों से युक्त है, (हिरण्यवत्) = ज्योति व वीर्यवाली हैं, हमारे ज्ञान को बढ़ानेवाली है [वीर्य ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है], (अश्वावत्) = उत्तम कर्मेन्द्रियोंवाली है, (गोमत्) = उत्तम ज्ञानेन्द्रियोंवाली है तथा (यवमत्) = 'बुराइयों को दूर करनेवाली व अच्छाइयों को हमारे साथ जोड़नेवाली' है [यु मिश्रणा - मिश्रणयोः] । [२] हे सोम ! (यूयम्) = तुम (हि) = ही (मम) = मेरे (पितरः) = रक्षक स्थन हो । (दिवः मूर्धान:) = तुम मेरे लिये प्रकाश के शिखर हो, मुझे ऊँचे से ऊँचे ज्ञान को प्राप्त करानेवाले हो । (प्रस्थिताः) = शरीर में प्रकर्षेण स्थित हुए हुए तुम (वयस्कृतः) = उत्तम आयुष्य को करनेवाले हो। हमारे जीवन को ये सोमकण ही दीर्घ व प्रशस्त बनाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ये सोम हमारा रक्षण करते हुए, प्रकाश को बढ़ाते हुए, हमारे जीवनों को उत्तम बनाते हैं ।
अन्य संदर्भ: सूचना- सुरक्षित सोम अन्नमयकोश को वसु [ उत्तम निवास] वाला [नीरोग] बनाते हैं । प्राणमयकोश को हिरण्यवाला [वीर्यवाला] बनाते हैं, इसी से दीर्घ जीवन प्राप्त होता है। मनोमयकोश को अश्वावत्-उत्तम कर्मेन्द्रियोंवाला, विज्ञानमयकोश को उत्तम ज्ञानेन्द्रियोंवाला तथा आनन्दमयकोश को यव [बुराइयों से रहित, अच्छाइयों से युक्त] बनाते हैं ।