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आ न॑: पवस्व॒ वसु॑म॒द्धिर॑ण्यव॒दश्वा॑व॒द्गोम॒द्यव॑मत्सु॒वीर्य॑म् । यू॒यं हि सो॑म पि॒तरो॒ मम॒ स्थन॑ दि॒वो मू॒र्धान॒: प्रस्थि॑ता वय॒स्कृत॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā naḥ pavasva vasumad dhiraṇyavad aśvāvad gomad yavamat suvīryam | yūyaṁ hi soma pitaro mama sthana divo mūrdhānaḥ prasthitā vayaskṛtaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । नः॒ । प॒व॒स्व॒ । वसु॑ऽमत् । हिर॑ण्यऽवत् । अश्व॑ऽवत् । गोऽम॑त् । यव॑ऽमत् । सु॒ऽवीर्य॑म् । यू॒यम् । हि । सो॒म॒ । पि॒तरः॑ । मम॑ । स्थन॑ । दि॒वः । मू॒र्धानः॑ । प्रऽस्थि॑ताः । व॒यः॒ऽकृतः॑ ॥ ९.६९.८

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:69» मन्त्र:8 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:22» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:8


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! (वसुमत्) ऐश्वर्यसंपन्न (हिरण्यवत्) स्वर्णादि धन के स्वामी (गोमत्) गवाद्यैश्वर्यवाले (अश्ववत्) विद्युदादि शक्तियों के स्वामी (यवमत्) अन्नधनाद्यैश्वर्ययुक्त आप (सुवीर्यं) सुन्दर पराक्रम को (नः) हम लोगों को (आ पवस्व) सब ओर से दें। (यूयम्) आप (हि) निश्चय करके (मम) मेरे (पितरः स्थन) पालन करनेवाले हैं और (वयस्कृतः) ऐश्वर्य के देनेवाले आप (दिवः) द्युलोक के (मूर्धानः) मुखरूप (प्रस्थिताः) विराजमान हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा से ऐश्वर्य की प्रार्थना की गई है ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'वसुमत्-हिरण्यवत्-अश्वावत्-गोमत्-यवमत्'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = सोम! तू (नः) = हमारे लिये (सुवीर्यम्) = उत्तम शक्ति को आपवस्व प्राप्त करा । जो शक्ति (वसुमत्) = उत्तम वसुओंवाली है, निवास को उत्तम बनानेवाले सब आवश्यक तत्त्वों से युक्त है, (हिरण्यवत्) = ज्योति व वीर्यवाली हैं, हमारे ज्ञान को बढ़ानेवाली है [वीर्य ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है], (अश्वावत्) = उत्तम कर्मेन्द्रियोंवाली है, (गोमत्) = उत्तम ज्ञानेन्द्रियोंवाली है तथा (यवमत्) = 'बुराइयों को दूर करनेवाली व अच्छाइयों को हमारे साथ जोड़नेवाली' है [यु मिश्रणा - मिश्रणयोः] । [२] हे सोम ! (यूयम्) = तुम (हि) = ही (मम) = मेरे (पितरः) = रक्षक स्थन हो । (दिवः मूर्धान:) = तुम मेरे लिये प्रकाश के शिखर हो, मुझे ऊँचे से ऊँचे ज्ञान को प्राप्त करानेवाले हो । (प्रस्थिताः) = शरीर में प्रकर्षेण स्थित हुए हुए तुम (वयस्कृतः) = उत्तम आयुष्य को करनेवाले हो। हमारे जीवन को ये सोमकण ही दीर्घ व प्रशस्त बनाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ये सोम हमारा रक्षण करते हुए, प्रकाश को बढ़ाते हुए, हमारे जीवनों को उत्तम बनाते हैं ।
अन्य संदर्भ: सूचना- सुरक्षित सोम अन्नमयकोश को वसु [ उत्तम निवास] वाला [नीरोग] बनाते हैं । प्राणमयकोश को हिरण्यवाला [वीर्यवाला] बनाते हैं, इसी से दीर्घ जीवन प्राप्त होता है। मनोमयकोश को अश्वावत्-उत्तम कर्मेन्द्रियोंवाला, विज्ञानमयकोश को उत्तम ज्ञानेन्द्रियोंवाला तथा आनन्दमयकोश को यव [बुराइयों से रहित, अच्छाइयों से युक्त] बनाते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे जगदीश ! (वसुमत्) ऐश्वर्यसम्पन्नः (हिरण्यवत्) स्वर्णादिधनस्वामी (गोमत्) गवाद्यैश्वर्यवान् (अश्ववत्) विद्युदादिशक्तेरीश्वरः (यवमत्) अन्नधनाद्यैश्वर्ययुक्तस्त्वं (सुवीर्यम्) सुपराक्रमं (नः) अस्मभ्यं (आ पवस्व) परितो देहि। (यूयम्) भवान् (हि) खलु (मम पितरः स्थन) अस्मत्पालनकर्ता भवतु। अथ च (वयस्कृतः) ऐश्वर्यदायको भवान् (दिवः) द्युलोकस्य (मूर्धानः) मुखरूपः (प्रस्थिताः) विराजमानोऽस्ति ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, lord of peace, progress and joy, bring us, purify and let flow, the wealth of peace and honour replete and overflowing with settlement and security, golden glory, progressive achievement, lands, cows and culture graces, food and good health, and noble courage, strength and forbearance. You alone are our father and mother, you alone would stay so constant, light of heaven, top of excellence, stable as earth, and giver of food, health and sustenance for a long full age.