पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सिन्धोः इव) = जैसे नदी के जल (निम्ने) = निम्न प्रदेश में जाते हैं, उसी प्रकार (वृषच्युताः) = [वृषो हि भगवान् धर्म:] धार्मिक पुरुष से शरीर में आसिक्त हुए हुए ये सोमकण (प्रवणे) - [easer, modesthu humer] सोमरक्षण के लिये उत्सुक नम्र पुरुष में (गातुं आशत) = मार्ग का व्यापन करते हैं, नम्र पुरुष में सुरक्षित होकर रहते हैं। ये सोमकण (आशवः) = उसे शीघ्रता से कार्यों में व्याप्त करनेवाले होते हैं। और (सदासः) = आनन्द व उल्लास का कारण बनते हैं । [२] ये सोम (नः निवेशे) = हमारे गृहों में (द्विपदे) = मनुष्यों के लिये व (चतुष्पदे) = पशुओं के लिये (शम्) = शान्ति को देनेवाले हों । हे सोम वीर्यशक्ते! (अस्मे) = हमारे लिये (वाजाः) = शक्तिशाली [ शक्ति के पुञ्ज] (कृष्टयः) = [A learned man] विद्वान् पुरुष (तिष्ठन्तु) = ठहरें । अर्थात् हमारी इस प्रकार के सशक्त विद्वान् पुरुषों के संग में उठने-बैठने की प्रवृत्ति हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-सोम का रक्षण, इनके रक्षण के लिये उत्सुक नम्र [प्रभु-भक्त] पुरुष ही कर पाते हैं। ये सोमकण हमारे घरों को सुन्दर बनाते हैं, क्योंकि इनके रक्षण से सब नीरोग रहते हैं। सोमरक्षण से हमारी रुचि ज्ञानी सशक्त पुरुषों के संग में उठने-बैठने की होती है।