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सिन्धो॑रिव प्रव॒णे नि॒म्न आ॒शवो॒ वृष॑च्युता॒ मदा॑सो गा॒तुमा॑शत । शं नो॑ निवे॒शे द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे॒ऽस्मे वाजा॑: सोम तिष्ठन्तु कृ॒ष्टय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sindhor iva pravaṇe nimna āśavo vṛṣacyutā madāso gātum āśata | śaṁ no niveśe dvipade catuṣpade sme vājāḥ soma tiṣṭhantu kṛṣṭayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सिन्धोः॑ऽइव । प्र॒व॒णे । नि॒म्ने । आ॒शवः॑ । वृष॑ऽच्युताः । मदा॑सः । गा॒तुम् । आ॒श॒त॒ । शम् । नः॒ । नि॒ऽवे॒शे । द्वि॒ऽपदे॑ । चतुः॑ऽपदे । अ॒स्मे इति॑ । वाजाः॑ । सो॒म॒ । ति॒ष्ठ॒न्तु॒ । कृ॒ष्टयः॑ ॥ ९.६९.७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:69» मन्त्र:7 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:22» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:7


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! आप (अस्मे) हमारी (निवेशे) स्थिति में (नः) हमारे (द्विपदे चतुष्पदे) मनुष्य तथा पशुओं के (शं) कल्याणकारी हों। तथा हमारी (कृष्टयः) बुद्धियें (तिष्ठन्तु) शुभ हों। (मदासः) आनन्दमय (आशवः) व्यापक आपके यश को (गातुं) गानकर इस प्रकार जिज्ञासु लोग आपके रूप में (आशत) लीन हों। जैसे (सिन्धोरिव) समुद्र के (प्रवणे निम्ने) निम्न प्रवाह में (वृषच्युताः) वेग से बहनेवाली नदियाँ मिलती हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा करुणासिन्धु हैं। जिस प्रकार क्षुद्र नदियाँ समुद्र में मिलकर महासागर हो जाती हैं, इसी प्रकार उक्त परमात्मा को मिलकर उपासक महत्त्व को धारण करता है ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वाजाः कृष्टयः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सिन्धोः इव) = जैसे नदी के जल (निम्ने) = निम्न प्रदेश में जाते हैं, उसी प्रकार (वृषच्युताः) = [वृषो हि भगवान् धर्म:] धार्मिक पुरुष से शरीर में आसिक्त हुए हुए ये सोमकण (प्रवणे) - [easer, modesthu humer] सोमरक्षण के लिये उत्सुक नम्र पुरुष में (गातुं आशत) = मार्ग का व्यापन करते हैं, नम्र पुरुष में सुरक्षित होकर रहते हैं। ये सोमकण (आशवः) = उसे शीघ्रता से कार्यों में व्याप्त करनेवाले होते हैं। और (सदासः) = आनन्द व उल्लास का कारण बनते हैं । [२] ये सोम (नः निवेशे) = हमारे गृहों में (द्विपदे) = मनुष्यों के लिये व (चतुष्पदे) = पशुओं के लिये (शम्) = शान्ति को देनेवाले हों । हे सोम वीर्यशक्ते! (अस्मे) = हमारे लिये (वाजाः) = शक्तिशाली [ शक्ति के पुञ्ज] (कृष्टयः) = [A learned man] विद्वान् पुरुष (तिष्ठन्तु) = ठहरें । अर्थात् हमारी इस प्रकार के सशक्त विद्वान् पुरुषों के संग में उठने-बैठने की प्रवृत्ति हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-सोम का रक्षण, इनके रक्षण के लिये उत्सुक नम्र [प्रभु-भक्त] पुरुष ही कर पाते हैं। ये सोमकण हमारे घरों को सुन्दर बनाते हैं, क्योंकि इनके रक्षण से सब नीरोग रहते हैं। सोमरक्षण से हमारी रुचि ज्ञानी सशक्त पुरुषों के संग में उठने-बैठने की होती है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे जगदीश्वर ! त्वं (अस्मे) अस्माकं (निवेशे) स्थितौ (नो द्विपदे चतुष्पदे) अस्मत्पशुमनुष्यादीनां (शम्) कल्याणं कुरुष्व। तथा मदीयाः (कृष्टयः) बुद्धयः (तिष्ठन्तु) शुभविषयिण्यो भवन्तु। (मदासः) आनन्दयुतं (आशवः) व्यापकं भवद्यशः (गातुम्) उपगीय एवं प्रकारेण जिज्ञासवस्तव रूपे (आशत) लीना भवन्तु। यथा (सिन्धोः इव) समुद्रस्य (निम्ने प्रवणे) निम्नप्रवाहे (वृषच्युताः) वेगवत्यो नद्यो मिलन्ति तद्वत् ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Floods of river waters showered from the clouds flow fast in their happy course down to the sea and mix with the ocean. Like these, may our people, joyous with showers of soma, fast and progressive, flow and proceed like water courses to the divine Indra. O Soma, lord of peace and joy, let there be peace and joy in our homesteads for humans and animals both. May our people and our powers and progress be firm and constant on the forward paths of higher achievement.