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त्वां मृ॑जन्ति॒ दश॒ योष॑णः सु॒तं सोम॒ ऋषि॑भिर्म॒तिभि॑र्धी॒तिभि॑र्हि॒तम् । अव्यो॒ वारे॑भिरु॒त दे॒वहू॑तिभि॒र्नृभि॑र्य॒तो वाज॒मा द॑र्षि सा॒तये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvām mṛjanti daśa yoṣaṇaḥ sutaṁ soma ṛṣibhir matibhir dhītibhir hitam | avyo vārebhir uta devahūtibhir nṛbhir yato vājam ā darṣi sātaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वाम् । मृ॒ज॒न्ति॒ । दश॑ । योष॑णः । सु॒तम् । सो॒म॒ । ऋषि॑ऽभिः । म॒तिऽभिः॑ । धी॒तिऽभिः॑ । हि॒तम् । अव्यः॑ । वारे॑भिः । उ॒त । दे॒वहू॑तिऽभिः । नृऽभिः॑ । य॒तः । वाज॑म् । आ । द॒र्षि॒ । सा॒तये॑ ॥ ९.६८.७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:68» मन्त्र:7 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:20» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:7


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आर्यमुनि

अब प्रसङ्गसङ्गति से परमात्मा की प्राप्ति का वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (सुतं) स्वयंसिद्ध (त्वां) तुमको (दश योषणः) धृत्यादि धर्म के दस साधन (मृजन्ति) साक्षात्कार करते हैं। (सोम) हे परमात्मन् ! तुम (मतिभिः) ज्ञानयोगी तथा (धीतिभिः) कर्मयोगी (ऋषिभिः) ऋषियों से (हितं) साक्षात्कार किये जाते हो तथा तुम (अव्यः) सर्वरक्षक हो। (उत) और (वारेभिः देवहूतिभिः नृभिः) सर्वोपरि वरणीय योगी मनुष्यों द्वारा (सातये) अज्ञाननिवृत्ति के लिए (वाजं) बल को (यतः) जिस हेतु (आदर्षि) देते हो, अतः तुम सर्वोपरि उपासनीय हो ॥७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगियों को अनन्त बल देता है, इसलिए मनुष्य को ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी अवश्य बनना चाहिए ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ऋषिभिर्मतिभिर्धीतिभिर्हितम् [स्वाध्याय - स्तुति - यज्ञ]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = शरीर में 'रस, रुधिर, मांस, अस्थि, मज्जा, मेदस् व वीर्य' इस क्रम से सप्तम स्थान में उत्पन्न हुए हुए सोम ! (त्वाम्) = तुझे (दश) = दस (योषण:) = बुराइयों से पृथक् करनेवाली, अच्छाइयों से संयुक्त करनेवाली चित्तवृत्तियाँ (मृजन्ति) = शुद्ध करती हैं । इन्द्रियों की संख्या दस है । उनके साथ सम्बद्ध चित्तवृत्तियों को भी यहाँ दस कहा गया है। ये शुद्ध होती हैं, तो सोम शुद्ध बना रहता है। यह सोम (ऋषिभिः) = [ऋषिर्वेदा] ज्ञान की वाणियों से, (मतिभिः) = मननपूर्वक होनेवाली स्तुतियों से तथा (धीतिभिः) = धारणात्मक कर्मों से (हितम्) = शरीर में स्थापित किया गया है । मस्तिष्क ज्ञानवाणियों से पूर्ण हो, मन स्तुति में लगा हो तथा शरीर धारणात्मक कर्मों में लगा हो तो वासनाओं का आक्रमण न होने से सोम शरीर में ही सुरक्षित रहता है । [२] हे सोम ! तू (अव्यः) = रक्षकों में उत्तम है। (वारेभिः) = वासनाओं का निवारण करनेवाले, (उत) = और (देवहूतिभिः) = उपासना में उस महान् देव को पुकारनेवाले (नृभिः) = मनुष्यों से (यतः) = शरीर में संयत हुआ-हुआ तू (वाजम्) = बल को (आदर्षि) = सर्वथा प्राप्त कराता है और (सातये) = हमारे लिये प्रभु प्राप्ति के लिये होता है। हमें तू प्रभु के सम्भजन की वृत्तिवाला बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सोमरक्षण के लिये 'स्वाध्याय, स्तवन व यज्ञ' सहायक होते हैं। सुरक्षित सोम हमें शक्ति देता है और प्रभु-प्रणव करता है।
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आर्यमुनि

अथ प्रसङ्गसङ्गत्या परमात्मप्राप्तिर्वर्ण्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (सुतम्) स्वयंसिद्धं (त्वाम्) भवन्तं (दश योषणः) दश धृत्यादिधर्मसाधनानि (मृजन्ति) साक्षात्कुर्वन्ति। (सोम) हे जगदीश ! (त्वं (मतिभिः) ज्ञानयोगिभिस्तथा (धीतिभिः) कर्मयोगिभिः (ऋषिभिः) तत्त्वदर्शिभिः (हितम्) साक्षात्कृतोऽसि। तथा त्वं (अव्यः) सर्वरक्षकोऽसि। (उत) अथ च (वारेभिर्देवहूतिभिर्नृभिः) वरणीयज्ञानयोगिकर्मयोगिमनुष्यद्वारा (सातये) अज्ञाननिवृत्तये (वाजम्) बलं (यतः) यस्मात् कारणात् (आदर्षि) ददास्यतः सर्वोपासनीयोऽसि ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, Spirit of the bliss of existence, ten youthful senses and vibrant pranas of the soul adore and exalt you, sung and celebrated by the sages of knowledge, thought and meditation, served by the best of men with best of homage and divine presentations, and realised and treasured by the seers. O lord of universal protection and progress, give us a vision of your divine power and presence for our ultimate victory and spiritual fulfilment.