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म॒न्द्रस्य॑ रू॒पं वि॑विदुर्मनी॒षिण॑: श्ये॒नो यदन्धो॒ अभ॑रत्परा॒वत॑: । तं म॑र्जयन्त सु॒वृधं॑ न॒दीष्वाँ उ॒शन्त॑मं॒शुं प॑रि॒यन्त॑मृ॒ग्मिय॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mandrasya rūpaṁ vividur manīṣiṇaḥ śyeno yad andho abharat parāvataḥ | tam marjayanta suvṛdhaṁ nadīṣv ām̐ uśantam aṁśum pariyantam ṛgmiyam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

म॒न्द्रस्य॑ । रू॒पम् । वि॒वि॒दुः॒ । म॒नी॒षिणः॑ । श्ये॒नः । यत् । अन्धः॑ । अभ॑रत् । प॒रा॒ऽवतः॑ । तम् । म॒र्ज॒य॒न्त॒ । सु॒ऽवृध॑म् । न॒दीषु॑ । आ । उ॒शन्त॑म् । अं॒शुम् । प॒रि॒ऽयन्त॑म् । ऋ॒ग्मिय॑म् ॥ ९.६८.६

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:68» मन्त्र:6 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:20» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्द्रस्य) आनन्दस्वरूप परमात्मा के (रूपं) रूप को (मनीषिणः) मेधावी लोग (विविदुः) जानते हैं। जो परमात्मा (परावतः) सब लोक-लोकान्तरों की (अभरत्) उत्पत्ति स्थिति और प्रलय करनेवाला है और (श्येनः) जो विद्युत् के समान (यदन्धः) सर्वव्यापक है, (तं) उस (ऋग्मियं) स्तवनीय (अंशुं) प्रकाशस्वरूप (सुवृधं) बढ़े हुए (उशन्तं) कान्तिवाले (परियन्तं) सर्वव्यापक परमात्मा का हम लोग (नदीषु) वेदवाणियों से (आ मर्जयन्त) साक्षात्कार करते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - आनन्दमय परमात्मा का साक्षात्कार कर्मयोग और ज्ञानयोग द्वारा संस्कृत बुद्धि से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं। इसी अभिप्राय से कहा है कि “दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” उसको सूक्ष्म बुद्धि से सूक्ष्मदर्शी ही देख सकते हैं, अन्य नहीं ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोम का स्तुति द्वारा शोधन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मनीषिणः) = ज्ञानी पुरुष (मन्द्रस्य) = आनन्दकर सोम के (रूपम्) = रूप को (विविदुः) = जानते हैं। (मनीषी) = समझते हैं कि किस प्रकार यह सोम आह्लाद का जनक है। (यद् अन्धः) यह जो सोम है, इसे (श्येन:) = शंसनीय गतिवाला पुरुष (परावतः) = सुदूर द्युलोक के हेतु से, मस्तिष्क के हेतु से (अभरत्) = अपने में धारण करता है। इस के रक्षण से ही तो मस्तिष्क का पोषण होता है। [२] (तम्) = उस (सुवृधम्) = उत्तम वृद्धि के कारणभूत (अंशुम्) = सोम को (नदीषु) = स्तुतियों में [नद - स्तोता ] (अमर्जयन्त) = सर्वथा शुद्ध करते हैं । स्तुति के द्वारा उस सोम का शोधन करते हैं, जो (उशन्तम्) = हमारे लिये दिव्यगुणों की कामनावाला होता है, हमारे में दिव्यगुणों का वर्धन करता है। (परियन्तम्) = शरीर में रुधिर के साथ चारों ओर गतिवाला होता है। (ऋग्मियम्) = स्तुति के योग्य होता है, अथवा हमें स्तुति की वृत्तिवाला बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-मनीषी लोग स्तुति द्वारा सोम को परिशुद्ध करते हैं। यह उनमें दिव्यगुणों का वर्धन करता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मन्द्रस्य रूपम्) परमात्मनो रूपं (मनीषिणः) मेधाविनः (विविदुः) विजानन्ति। यः परमेश्वरः (परावतः) समस्तलोकलोकान्तराणाम् (अभरत्)  उत्पादकः स्थापको नाशकश्चास्ति। अथ च (श्येनः) यो विद्युदिव (यदन्धः) सर्वव्यापकोऽस्ति (तम्) तं (ऋग्मियम्) स्तुत्यं (अंशुम्) प्रकाशरूपं (सुवृधम्) वर्धमानं (उशन्तम्) कान्तिमन्तं (परियन्तम्) सर्वत्र व्याप्तं परमात्मानं (नदीषु) वेदवाणीभिः (आमर्जयन्त) वयं साक्षात्कुर्मः ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The yogis of elevated, enlightened and concentrated mind feel and know the presence of the blissful soma spirit of existence which the vibrant visionary soul perceives, distils and actually realises as food for fulfilment far off and everywhere. The sages adore and worship that very exalting spirit flowing in streams of existence which is passionate and loving, energising, all comprehensive and adorable, sung and celebrated in hymns of the Veda.