पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह सोम मातरा द्युलोक व पृथिवीलोक में, मस्तिष्क व शरीर में (विचरन्) = गति करता हुआ तथा (अपः) = अन्तरिक्षलोक को [नि० १ । ३] (वाजयन्) = सबल करता हुआ, हृदय को सबल बनाता हुआ, (मेधिरः) = प्रकृष्ट बुद्धिवाला होता हुआ (स्वधया) = आत्मधारणशक्ति के द्वारा (पदम्) = उस प्राप्त करने योग्य प्रभु को (प्रपिन्वते) = हमारे में बढ़ाता है। सुरक्षित सोम शरीर को सशक्त, मस्तिष्क को दीप्त ज्ञानाग्निवाला तथा हृदय को सबल बनाता है। हमें बुद्धिमान् बनाकर प्रभु प्राप्ति के योग्य करता है। [२] (अंशुः) = प्रकाश की किरणोंवाला यह सोम (यवेन) = बुराइयों के अमिश्रण व अच्छाइयों के मिश्रण से पिपिशे जीवन को अलंकृत कर देता है [To adore ] । (नृभिः) = उन्नतिपथ पर चलनेवाले लोगों से (यतः) = काबू किया हुआ यह सोम (जामिभिः) = सद्गुणों के विकास से (संनसते) = सम्यक् गतिवाला होता है और (शिरः रक्षते) = मस्तिष्क का रक्षण करता है । सोमरक्षण से मस्तिष्क का उत्तम रक्षण होता है। वस्तुतः ज्ञानाग्नि का एक मात्र ईंधन सोम ही है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम शरीर, मस्तिष्क व हृदय तीनों को ही सुन्दर बनाता है। यह सब बुराइयों को दूर करके जीवन को सजा देता है ।