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प्र दे॒वमच्छा॒ मधु॑मन्त॒ इन्द॒वोऽसि॑ष्यदन्त॒ गाव॒ आ न धे॒नव॑: । ब॒र्हि॒षदो॑ वच॒नाव॑न्त॒ ऊध॑भिः परि॒स्रुत॑मु॒स्रिया॑ नि॒र्णिजं॑ धिरे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra devam acchā madhumanta indavo siṣyadanta gāva ā na dhenavaḥ | barhiṣado vacanāvanta ūdhabhiḥ parisrutam usriyā nirṇijaṁ dhire ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । दे॒वम् । अच्छ॑ । मधु॑ऽमन्तः । इन्द॑वः । असि॑स्यदन्त । गावः॑ । आ । न । धे॒नवः॑ । ब॒र्हि॒ऽसदः॑ । व॒च॒नाऽव॑न्तः । ऊध॑ऽभिः । प॒रि॒ऽस्रुत॑म् । उ॒स्रियाः॑ । निः॒ऽनिज॑म् । धि॒रे॒ ॥ ९.६८.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:68» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:19» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब ईश्वर के उपासकों के गुणवर्णन करते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दवः) परम विद्वान् (मधुमन्तः) मीठे उपदेशोंवाले (देवं) परमात्मा को (अच्छ) प्रति (प्रासिष्यदन्त) नम्रीभूत होकर जाते हैं। जैसे (गावो धेनवो न) प्रकाश करनेवाली वाणियाँ (वचनावन्तः) सदुपदेशवाली (बर्हिषदः) प्रतिष्ठावाली (ऊधभिः) ज्ञानरूपी अमृत को धारण करनेवाली (उस्रियाः) सुदीप्तिवाली (परिश्रुतं) व्याप्तशील (निर्णिजं) शुद्ध ज्ञान को (आधिरे) धारण कराती हैं, इसी प्रकार उक्त विद्वान् ज्ञान को धारण कराते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के मार्ग का उपदेश करनेवाले विद्वान् वाग्धेनु के समान सद्ज्ञान का उपदेश करते हैं। जिस प्रकार सद्वाणी सद् ज्ञान को उत्पन्न करती है, इसी प्रकार सम्यग्ज्ञाता विद्वान् सत् का उपदेश करके सच्चे ज्ञान का उपदेश करते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वेदवाणी रूप गौ का दोहन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मधुमन्तः) = अपने अन्दर माधुर्य को लिये हुए, अपने रक्षक के जीवन को मधुर बनाते हुए, (इन्दवः) = सोमकण (देवं अच्छा) = उस महान् देव प्रभु की ओर (असिष्यदन्त) = गतिवाले होते हैं। ये सोमकण हमें प्रभु की ओर ले चलते हैं। उसी प्रकार, (न) = जैसे कि (धेनवः) = ज्ञानदुग्ध से प्रीणित करनेवाली (गावः) = ये वेदवाणी रूप गौवें हमें प्रभु की ओर ले चलती हैं। वस्तुतः प्रभु प्राप्ति के मुख्य साधन यही हैं [क] सोमरक्षण, [ख] वेदवाणियों का उपासन। [२] इसलिए (बर्हिषदः) = वासनाशून्य निर्मल हृदय में आसीन होनेवाले (वचनावन्तः) = प्रभु की प्रशस्त स्तुति वाणियोंवाले लोग (उस्त्रिया:) = ज्ञानदुग्धदात्री वेदवाणी रूप गौवों से (उधभिः परिस्स्रुतम्) = ऊधस् से (परिस्स्रुत निर्णिजम्) = जीवन के शोधक ज्ञानदुग्ध को (धिरे) = अपने में धारण करते हैं। 'गां पयो दोग्धि' की तरह यह द्विकर्मक वाक्य है 'उस्त्रियानिर्णिजं धिरे'। वेदवाणी गौ से ज्ञानदुग्ध को दोहते हैं । यह ज्ञानदुग्ध शुद्ध करनेवाला है, सो 'निर्णिक्' कहलाया है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सोमरक्षण करें। सोम द्वारा ज्ञानाग्नि को दीप्त करके वेदवाणी रूप गौ से ज्ञानदुग्ध को प्राप्त करें।
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आर्यमुनि

अथेश्वरोपासकानां विदुषां गुणा वर्ण्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दवः) विद्वांसः (मधुमन्तः) मधुरोपदेशवन्तः (देवम्) परमात्मानं (अच्छ) प्रति (प्रासिष्यदन्त) नम्रतयोपगच्छन्ति। (गावो धेनवो न) यथा प्रकाशिका वाण्यः (वचनावन्तः) सदुपदेशवत्यः (बर्हिषदः) प्रतिष्ठिताः (ऊधभिः) ज्ञानामृतधारिण्यः (उस्रियाः) दीप्तिमत्यः (परिश्रुतम्) व्याप्तशीलं (निर्णिजम्) शुद्धज्ञानं (आधिरे) दधति तथोक्ता विद्वांसो ज्ञानं धारयन्ति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Seekers of the light and soma sweetness of divinity, themselves noble and refined with honey sweets of culture, manners and holy language, approach the refulgent and generous divine lord like calves going to mother cows. Sitting on the holy grass of yajna at dawn, eloquent of tongue and clear of understanding, they receive and treasure the nectar stream of soma, peace and bliss of divinity, as calves receive milk streaming from the udders or as dawns receive radiations of light from the sun over the night’s darkness.