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हि॒न्वन्ति॒ सूर॒मुस्र॑य॒: पव॑मानं मधु॒श्चुत॑म् । अ॒भि गि॒रा सम॑स्वरन् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
hinvanti sūram usrayaḥ pavamānam madhuścutam | abhi girā sam asvaran ||
पद पाठ
हि॒न्वन्ति॑ । सूर॑म् । उस्र॑यः । पव॑मानम् । म॒धु॒ऽश्चुत॑म् । अ॒भि । गि॒रा । सम् । अ॒स्व॒र॒न् ॥ ९.६७.९
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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:67» मन्त्र:9
| अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:14» मन्त्र:4
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:9
आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (उस्रयः) ज्ञानी लोग (पवमानम्) पवित्र करनेवाले (मधुश्चुतं) आनन्द की वृष्टि करनेवाले (सूरम्) परमात्मा की (गिरा) वेदवाणियों से (समस्वरन्) स्तुति करते हुए (अभिहिन्वन्ति) सब ओर से साक्षात्कार करते हैं ॥९॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग वेदवाणियों द्वारा पूर्वोक्त परमात्मा की स्तुति करते हैं ॥९॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
उस्रयः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उस्स्रयः) = [उस्रि - going ] गतिशील पुरुष, गतमन्त्र के 'आयव:' (सूरम्) = इन कर्मों में प्रेरित करनेवाले सोम को (हिन्वन्ति) = अपने अन्दर प्रेरित करते हैं। (पवमानम्) = यह सोम पवित्र करनेवाला है, (मधुश्चुतम्) = शरीर में माधुर्य को टपकानेवाला है, यही जीवन को मधुर बनाता है । [२] इस सोम के रक्षण के उद्देश्य से ही प्रशस्तेन्द्रियोंवाले लोग [गोतमाः] (गिरा) = स्तुतिवाणियों के द्वारा (अभि) = दिन के दोनों ओर प्रातः- सायं, (सं अस्वरन्) = सम्यक् उस प्रभु का स्तवन करते हैं। यह प्रभु-स्तवन ही उन्हें वासनाओं से बचाकर सोमरक्षण के योग्य करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- 'गतिशीलता व प्रभु की उपासना' हमें सोमरक्षण में समर्थ करती है । इस सोमरक्षण से सब कष्टों से ऊपर उठकर ये 'अत्रि' बनते हैं, आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक कष्टों से ऊपर। ये सोम स्तवन करते हुए कहते हैं-
आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (उस्रयः) ज्ञानिनो जनाः (पवमानम्) पवितारम् (मधुश्चुतम्) आमोदवर्षकं (सूरम्) परमात्मानं (गिरा) वेदवाग्भिः (समस्वरन्) स्तुतिं कुर्वन्ति (अभि हिन्वन्ति) परितः साक्षात्कुर्वन्ति ॥९॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - As morning lights of the dawn exhort and exalt the sun, so do brilliant sages invoke and exalt the honey sweet vibrant and sanctifying soma bliss of divinity while they sing and adore the divinity with their songs of celebration.
