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देवता: पवमानः सोमः ऋषि: कश्यपः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः

आ न॑ इन्दो शत॒ग्विनं॑ र॒यिं गोम॑न्तम॒श्विन॑म् । भरा॑ सोम सह॒स्रिण॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā na indo śatagvinaṁ rayiṁ gomantam aśvinam | bharā soma sahasriṇam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । नः॒ । इ॒न्दो॒ इति॑ । श॒त॒ऽग्विन॑म् । र॒यिम् । गोऽम॑न्तम् । अ॒श्विन॑म् । भर॑ । सो॒म॒ । स॒ह॒स्रिण॑म् ॥ ९.६७.६

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:67» मन्त्र:6 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:14» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! आप (शतग्विनम्) सैकड़ों प्रकार की शक्तिवाले (गोमन्तं) तथा ऐश्वर्ययुक्त (अश्विनं) सर्वत्र व्यापक (सहस्रिणं) हजारों प्रकार के (रयिम्) धन को (नः) हमको (आभर) दीजिये ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सहस्रों प्रकार के ऐश्वर्यों का प्रदान करनेवाला है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उस रयि को

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले (सोम) = वीर्यशक्ते ! (नः) = हमारे लिये (रयिम्) = उस ऐश्वर्य को (आभर) = सर्वथा प्राप्त करा । जो (शतग्विनम्) = [ शतं गच्छति] शतवर्षपर्यन्त ठीक प्रकार से चलता है । (गोमन्तम्) = जो प्रशस्त ज्ञानेन्द्रियोंवाला है तथा (अश्विनम्) = प्रशस्त कर्मेन्द्रियोंवाला है । हम सोम के द्वारा उस ऐश्वर्य को प्राप्त करें जो [क] हमारे शतवर्षगामी जीवन को प्राप्त कराये, [ख] ज्ञानेन्द्रियों को उत्तम बनाये [ग] तथा कर्मेन्द्रियों को सशक्त करे । [२] यह ऐश्वर्य (सहस्रिणम्) = हमें 'स+हस्' सदा आमोद-प्रमोद से युक्त रखे। इससे हमारा जीवन उल्लासमय बना रहे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण 'दीर्घ जीवन, उत्तम इन्द्रियों व उल्लास' का कारण बने । सोमरक्षण से उत्तम इन्द्रियोंवाला यह 'गो-तम' बनता है। यह सोम-स्तवन करता हुआ कहता है-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! भवान् (शतग्विनम्) शतविधशक्तिमत् तथा (गोमन्तम्) ऐश्वर्ययुक्तं (अश्विनम्) सर्वत्र व्यापकं (सहस्रिणम्) सहस्रविधं (रयिम्) धनम् (नः) अस्मभ्यम् (आभर) ददातु ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indu, Soma, lord of love, beauty, peace and glory, bear and bring us wealth, honour and excellence of a hundred and a thousand kinds, of lands and cows, horses, advancement and victory, above all settlement, peace and happiness.