इन्दु॑र्हिन्वा॒नो अ॑र्षति ति॒रो वारा॑ण्य॒व्यया॑ । हरि॒र्वाज॑मचिक्रदत् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
indur hinvāno arṣati tiro vārāṇy avyayā | harir vājam acikradat ||
पद पाठ
इन्दुः॑ । हि॒न्वा॒नः । अ॒र्ष॒ति॒ । ति॒रः । वारा॑णि । अ॒व्यया॑ । हरिः॑ । वाज॑म् । अ॒चि॒क्र॒द॒त् ॥ ९.६७.४
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:67» मन्त्र:4
| अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:13» मन्त्र:4
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:4
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दुः) स्वयंप्रकाश (हिन्वानः) सर्वप्रेरक परमात्मा (तिरः) अज्ञान को तिरस्कार करके (वाराणि) वरण करने योग्य (अव्यया) नित्य ज्ञानों को (अर्षति) देता है। (हरिः) पूर्वोक्त परमेश्वर ज्ञान देने के लिए (वाजम्) बलपूर्वक (अचिक्रदत्) आह्वान करता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में अज्ञान को निवृत्त करके ईश्वर के सद्गुणों के धारण का उपदेश किया गया है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
हरिः वाजम् अचिक्रदत्
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्दुः) = हमें शक्तिशाली बनानेवाला सोम (हिन्वानः) = शरीर में प्रेरित किया जाता हुआ (तिरः) = तिरोहित रूप में, छिपे रूप में, (अर्षति) = हमें प्राप्त होता है । रुधिर के अन्दर व्याप्त हुआ- हुआ यह सोम दिखता तो न ही, पर रुधिर में सर्वत्र होता है। इस प्रकार यह उन्हीं वाराणि इन्द्रिय द्वारों को [वाराणि: द्वाराणि] प्राप्त होता है, जो कि (अव्यया) = [अवि अय्] विविध विषयों की ओर जानेवाले नहीं हैं। जिस समय हम इन्द्रिय द्वारों को विषयों से रोकते हैं, इन्द्रियों को विषयों में नहीं जाने देते, तभी ये सोमकण शरीर में तिरोहित होकर रहते हैं । [२] (हरिः) = यह सब अशुभों का हरण करनेवाला सोम वाजं (अचिक्रदत्) = शक्ति को पुकारता है, अर्थात् जीवन का लक्ष्य शक्ति-सम्पादन को बना देता है। इस सुरक्षित सोम से शक्ति-सम्पन्न होकर हम सब बुराइयों से ऊपर उठते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- इन्द्रियों को विषयों में भटकने से बचायेंगे तो सोम हमारे अन्दर तिरोहित रूप में निवास करेगा। यह हमें शक्ति सम्पन्न बनाकर सब कष्टों से बचायेगा ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दुः) स्वयम्प्रकाशः (हिन्वानः) सर्वप्रेरकः परमेश्वरः (तिरः) अज्ञानानि तिरस्कृत्य (वाराणि) वरणीयानि (अव्यया) नित्यज्ञानानि (अर्षति) ददाति। (हरिः) पापहारकः परमात्मा ज्ञानदानाय (वाजम्) बलपूर्वकम् (अचिक्रदत्) अस्मानाह्वयति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Invoked, exalted and inspiring, divine Soma manifests and vibrates, and across all obstructions gives cherished and imperishable gifts. The spirit that eliminates all want and suffering exhorts us to action and victory.
