पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (पावमाना:) = जीवन को पवित्र बनानेवाली इन ऋचाओं को अध्येति स्मरण करता है, वह जानता है कि (ऋषिभिः) = तत्त्वद्रष्टाओं से (संभृतं रसम्) = धारण किया गया यह वेद का सार है । [२] इस को सदा स्मरण करनेवाले, इसको जीवन में अनूदित करनेवाले (तस्मै) = उस ज्ञानी पुरुष के लिये (सरस्वती) = ज्ञान की अधिष्ठातृ देवता (क्षीरम्) = क्षीर-दूध, (सर्पिः) = घृत, (मधु) = शहद व (उदकम्) = जल को दुहे प्रपूरित करती है। उसे दूध, घी, शहद व जल की कमी नहीं रहती । वह ऐसे ही सात्त्विक पदार्थों का प्रयोग करता है। इन सात्त्विक पदार्थों का प्रयोग करता हुआ वह पवमान सोम का अपने में रक्षण करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम के महत्त्व को समझकर, सोमरक्षण करनेवाला पुरुष क्षीर, मधु व उदक आदि सात्त्विक पदार्थों का ही प्रयोग करता है। यह सोमरक्षक पुरुष प्रभु के नामों का उच्चारण करता है [वदति इति वत्सः] प्रभु का 'वत्स' होता है। अपने सत्कर्मों से प्रभु को प्रीणित करनेवाला 'प्री' है, 'वत्सप्री'। यह भालम् - प्रकाश को (दन:) = [दानमनसः नि० ६ । १२] देने की कामनावाला 'भालन्दन' है। सोमरक्षण से दीप्त ज्ञानाग्निवाला बनकर प्रकाश को प्राप्त करता है। और उसी प्रकाश को सर्वत्र देने की कामना करता है-