त्वं सु॑ष्वा॒णो अद्रि॑भिर॒भ्य॑र्ष॒ कनि॑क्रदत् । द्यु॒मन्तं॒ शुष्म॑मुत्त॒मम् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
tvaṁ suṣvāṇo adribhir abhy arṣa kanikradat | dyumantaṁ śuṣmam uttamam ||
पद पाठ
त्वम् । सु॒स्वा॒नः । अद्रि॑ऽभिः । अ॒भि । अ॒र्ष॒ । कनि॑क्रदत् । द्यु॒ऽमन्त॑म् । शुष्म॑म् । उ॒त्ऽत॒मम् ॥ ९.६७.३
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:67» मन्त्र:3
| अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:13» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:3
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (त्वं) आप (कनिक्रदत्) वेदरूपी वाणियों द्वारा (सुष्वाणः) स्तूयमान हैं। (द्युमन्तं) दीप्तिवाले (उत्तमं) सबसे अच्छे (शुष्मं) बल को (अद्रिभिः) अपने आदरणीय शक्तियों से (अभ्यर्ष) प्राप्त कराइये ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा वेदवाणियों के द्वारा ज्ञानरूपी बल को प्रदान करता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
घुमान् शुष्म
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! (अद्रिभि:) = [adore] प्रभु के उपासकों से (सुष्वाणः) = उत्पन्न किया जाता हुआ (त्वम्) = तू (कनिक्रदत्) = प्रभु का आह्वान करता हुआ, हमारी वृत्ति को और अधिक प्रभु-प्रवण करता हुआ, (द्युमन्तम्) = ज्योतिर्मय (उत्तमं शुष्मम्) = उत्तम बल को अभ्यर्ष हमें प्राप्त करा । [२] प्रभु की उपासना से, विषय-वासनाओं से बचकर हम सोम का रक्षण करते हैं। यह सोम हमें और अधिक प्रभु-स्तवन की वृत्तिवाला बनाता है। उस समय हमें उत्कृष्ट ज्ञान की ज्योति से युक्त बल की प्राप्ति होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम ज्ञान व बल को प्राप्त कराता है। इस ज्योतिर्मय बल को प्राप्त करनेवाला यह व्यक्ति 'कश्यप' है, ज्ञानी है [पश्यकः] । यह सोम-स्तवन करता हुआ कहता है-
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (त्वम्) भवान् (कनिक्रदत्) वेदवाणीभिः (सुष्वाणः) स्तूयमानोऽस्ति। एवम्भूतस्त्वं (द्युमन्तम्) दीप्तिमत् (उत्तमम्) सर्वोत्कृष्टं (शुष्मम्) बलं (अद्रिभिः) स्वकीयादरणीयशक्तिभिः (अभ्यर्ष) प्रापय ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - You, stirred by the brave celebrants in yajna and meditation, arise and sanctify loud and bold, bringing us showers of bliss, highest and most vigorous strength and power for living a life of purity and happy fulfilment.
