प्र प्या॑यस्व॒ प्र स्य॑न्दस्व॒ सोम॒ विश्वे॑भिरं॒शुभि॑: । दे॒वेभ्य॑ उत्त॒मं ह॒विः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
pra pyāyasva pra syandasva soma viśvebhir aṁśubhiḥ | devebhya uttamaṁ haviḥ ||
पद पाठ
प्र । प्या॒य॒स्व॒ । प्र । स्य॒न्द॒स्व॒ । सोम॑ । विश्वे॑भिः । अं॒शुऽभिः॑ । दे॒वेभ्यः॑ । उ॒त्ऽत॒मम् । ह॒विः ॥ ९.६७.२८
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:67» मन्त्र:28
| अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:18» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:28
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! आप (प्रप्यायस्व) हमको वृद्धियुक्त करें। तथा (विश्वेभिरंशुभिः) अपने सम्पूर्ण भावों से द्रवीभूत होकर (प्रस्यन्दस्व) कृपायुक्त हों। तथा (देवेभ्यः) विद्वानों के लिए (उत्तमं हविः) उत्तम दानरूपी भावों का प्रदान करें ॥२८॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ही एकमात्र तृप्ति का कारण है। वह अपने ज्ञान के प्रदान से हमको तृप्त करे ॥२८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
विश्वेभि: अंशुभिः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम वीर्यशक्ते ! (प्रप्यायस्व) = हमारा तू सब प्रकार से उत्कृष्ट वर्धन कर। तू (विश्वेभिः) = सब (अंशुभिः) = ज्ञान की रश्मियों के द्वारा (प्रस्वन्दस्व) = हमारे शरीरों में प्रकर्षेण गतिवाला हो। [२] (देवेभ्यः) = दिव्यगुणों की प्राप्ति के लिये तू (उत्तमं हविः) = सर्वोत्तम आदान करने योग्य वस्तु है [ हु आदाने, हु दानादानयोः] । पवित्र वस्तु को 'हवि' या 'हव्य पदार्थ' कहते हैं । सोम सर्वोत्तम हवि है । इसके रक्षण से दिव्यगुणों का वर्धन होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमारा वर्धन करे। प्रकाश की किरणों के साथ हमें प्राप्त हो। यह सोम दिव्यगुणों को प्राप्त करानेवाला है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! त्वं (प्रप्यायस्व) मां वर्द्धय। तथा (विश्वेभिरंशुभिः) स्वीयसम्पूर्णभावैर्द्रवीभूय (प्रस्यन्दस्व) कृपालुर्भव। तथा (देवेभ्यः) विद्वद्भ्यः (उत्तमं हविः) सर्वोत्तमदानरूपभावान् प्रदेहि ॥२८॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, spirit of life and fulfilment, flow abundant, flow exuberant with all the shoots and sprouts of life and with the best yajnic offerings for the divinities. Make up our wants and deficiencies.
