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ए॒ष तु॒न्नो अ॒भिष्टु॑तः प॒वित्र॒मति॑ गाहते । र॒क्षो॒हा वार॑म॒व्यय॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eṣa tunno abhiṣṭutaḥ pavitram ati gāhate | rakṣohā vāram avyayam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒षः । तु॒न्नः । अ॒भिऽस्तु॑तः । प॒वित्र॑म् । अति॑ । गा॒ह॒ते॒ । र॒क्षः॒ऽहा । वार॑म् । अ॒व्यय॑म् ॥ ९.६७.२०

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:67» मन्त्र:20 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:16» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:20


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) उक्त परमात्मा (तुन्नः) जो अज्ञाननिवृत्ति द्वारा आविर्भाव को प्राप्त हुआ है और (अभिष्टुतः) सब प्रकार से स्तुति किया गया है, वह (पवित्रम्) पवित्र अन्तःकरण को (अति गाहते) प्रकाशित करता है और (रक्षोहा) दुष्टों का विघातक है तथा (अव्ययम्) अविनाशी और (वारम्) भजनीय है ॥२०॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा के दण्डदातृत्व और अविनाशित्वादि धर्मों का कथन किया गया है ॥२०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रक्षोहा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एषः) = यह सोम (तुन्नः) = प्राणायामादि द्वारा शरीर के अन्दर प्रेरित हुआ-हुआ (अभिष्टुतः) = प्रातः - सायं स्तुत होता हुआ (पवित्रम्) = पवित्र हृदयवाले पुरुष को (अतिगाहते) = अतिशयेन आलोडित करता है, पवित्र हृदय वाले पुरुष में व्याप्त होता है । [२] यह (वारम्) = सब वासनाओं का निवारण करनेवाले व (अव्ययम्) = विविध विषय-वासनाओं में न जानेवाले पुरुष को प्राप्त होता है और (रक्षोहा) = सब रोगकृमिरूप राक्षसों का तथा राक्षसी भावों का (आसुरी वृत्तियों का) विनष्ट करनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में व्याप्त सोम सब रोगकृमिरूप राक्षसों व काम आदि आसुरभावों का विनाशक है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एषः) पूर्वोक्तः परमात्मा (तुन्नः) योऽज्ञाननिवृत्त्याऽऽविर्भूतस्तथा (अभिष्टुतः) सर्वथा स्तुतः स जगदीश्वरः (पवित्रम्) शुद्धान्तःकरणं (अतिगाहते) प्रकाशितं करोति। अथ च (रक्षोहा) दुष्टनाशकस्तथा (अव्ययम्) अविनाशी परमात्मास्ति तथा (वारम्) भजनीयश्च ॥२०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This Soma, thus invoked, stirred and adored, arises and vibrates in the pure heart of the celebrant and, dispelling negativities, confusions and darkness of illusion, energises its favourite and imperishable spirit of humanity.