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ते सु॒तासो॑ म॒दिन्त॑माः शु॒क्रा वा॒युम॑सृक्षत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

te sutāso madintamāḥ śukrā vāyum asṛkṣata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ते । सु॒तासः॑ । म॒दिन्ऽत॑माः । शु॒क्राः । वा॒युम् । अ॒सृ॒क्ष॒त॒ ॥ ९.६७.१८

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:67» मन्त्र:18 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:16» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:18


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) तुम्हारे (सुतासः) संस्कृत (मदिन्तमाः) आह्लादजनक (शुक्राः) स्वभाव (वायुं) कर्मयोगी को (असृक्षत) उत्पन्न करते हैं ॥१८॥
भावार्थभाषाः - तात्पर्य यह है कि जिसको परमात्मा उत्तम शील देता है, वही कर्मयोगी बनता है, अन्य नहीं ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मदिन्तमाः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ते) = वे (सुतासः) = उत्पन्न हुए हुए सोम (मदिन्तमाः) = हमें अतिशयेन आनन्दित करनेवाले हैं । [२] (शुक्राः) = हमें शुचि व दीप्त बनानेवाले ये सोम (वायुम्) = गति के द्वारा सब बुराइयों को नष्ट करनेवाले को (असृक्षत) = उत्पन्न करते हैं। हमें ये गतिशील व निर्मल बनाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमें आनन्दित करनेवाले व गतिशील बनानेवाले हैं। यह सोमरक्षक पुरुष अतिशयेन उत्तम निवासवाला 'वसिष्ठ' बनता है, और कहता है कि-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते) भवतः (सुतासः) संस्कृताः (मदिन्तमाः) आमोदजनकाः (शुक्राः) स्वभावाः (वायुम्) कर्मयोगिनम् (असृक्षत) उत्पादयन्ति ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Your creative spirits of imagination, powerful and most ecstatic, give birth to the vibrant poet creator, the karma yogi of imagination.