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परि॒ प्र सो॑म ते॒ रसोऽस॑र्जि क॒लशे॑ सु॒तः । श्ये॒नो न त॒क्तो अ॑र्षति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pari pra soma te raso sarji kalaśe sutaḥ | śyeno na takto arṣati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि॑ । प्र । सो॒म॒ । ते॒ । रसः॑ । अस॑र्जि । क॒लशे॑ । सु॒तः । श्ये॒नः । न । त॒क्तः । अ॒र्ष॒ति॒ ॥ ९.६७.१५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:67» मन्त्र:15 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:15» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:15


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! (श्येनो न) जैसे विद्युत् (अर्षति) सर्वत्र गमन करती है तथा (ते) आपका (सुतः) स्वतःसिद्ध (तक्तः) सर्वत्र गमनशील (रसः) आनन्द (परि) चारों ओर (कलशे) पवित्र अन्तःकरण में (प्रासर्जि) स्थिर होता है ॥१५॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार परमात्मा सर्वत्र व्यापक है, इसी प्रकार उसके आनन्द आदि गुण भी सर्वत्र व्यापक हैं ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कलशे सुतः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते! (ते रसः) = तेरा रस (परि असर्जि) = शरीर में सर्वतः सृष्ट होता है। यह सोम रस (कलशे) = इस सोलह कलाओं के निवास स्थान भूत शरीर में ही (सुतः) = उत्पन्न होता है । [२] इस में उत्पन्न हुआ हुआ यह रस (श्येनः न) = शंसनीय गतिवाले के समान (तक्तः) = शरीर में गतिवाला होता हुआ (अर्षति) = हमें प्राप्त होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इस सोम के द्वारा ही यह शरीर 'कलश' बनता है, सब कलाओं का आधार बनता है। यही हमें शंसनीय गतिवाला बनाता है। इससे शरीर व शरीरस्थ वैश्वानर अनि ठीक बनी रहती है, सो सोमरक्षक 'जमदग्नि' बनता है। यह जमदग्नि कहता है-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे जगन्नियन्तः ! (श्येनो न) यथा विद्युद् (अर्षति) सर्वत्र गच्छति तथा (ते) भवतः (सुतः) स्वयंसिद्धः (तक्तः) सर्वगः (रसः) आनन्दः (परि) सर्वतः (कलशे) पूतान्तःकरणेषु (प्रासर्जि) स्थिरो भवति ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, spirit of light and passion of imagination, the ecstatic joy of your creativity distilled and treasured in the poetic soul flows free like the tempestuous eagle bird traversing space and creates songs of divine adoration for life’s mystery.