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त्वं सो॑मासि धार॒युर्म॒न्द्र ओजि॑ष्ठो अध्व॒रे । पव॑स्व मंह॒यद्र॑यिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ somāsi dhārayur mandra ojiṣṭho adhvare | pavasva maṁhayadrayiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । सो॒म॒ । अ॒सि॒ । धा॒र॒युः । म॒न्द्रः । ओजि॑ष्ठः । अ॒ध्व॒रे । पव॑स्व । मं॒ह॒यत्ऽर॑यिः ॥ ९.६७.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:67» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:13» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब गुणान्तरों से परमात्मा की स्तुति करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! (त्वं) तुम (धारयुः) धारण शक्तिवाले हो तथा (मन्द्रः) तुम आनन्दप्रद हो और (ओजिष्ठः) ओजस्वी हो तथा आप (अध्वरे) यज्ञ में (मंहद्रयिः) धन प्रदान करते हुए (पवस्व) हमारी रक्षा करें ॥१॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा को सर्वाधार कथन किया गया है और सम्पूर्ण धनों का दाता रूप से वर्णन किया गया है ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'दारयु- मन्द्र - ओजिष्ठ' सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते ! (त्वम्) = तू (धारयुः असि) = धारण करनेवाला है । (मन्द्रः) = हमारे जीवन को उल्लासमय बनानेवाला है। (ओजिष्ठ:) = ओजस्वितम है । सम्पूर्ण ओज का मूल तू ही तो है । [२] (अध्वरे) = इस जीव - यज्ञ में (मंहयद्रयिः) = ऐश्वर्य को देनेवाला होता हुआ तू (पवस्व)= हमें प्राप्त हो । जीवन-यज्ञ की उत्तम पूर्ति के लिये सब कोशों की सम्पत्ति को यह सोम ही प्राप्त कराता है। 'तेज-वीर्य-बल व ओज मन्यु तथा सहस्' को प्राप्त कराके यह हमारे जीवन-यज्ञ को सफल करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम ही हमारा धारण करता है। सब कोशों के ऐश्वर्य को प्राप्त कराके हमारे जीवन-यज्ञ को सफल करता है।
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आर्यमुनि

अथ गुणान्तरेण परमात्मा स्तूयते।

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) परमेश्वर ! (त्वम्) भवान् (धारयुः) धारणशक्तिमान् तथा (मन्द्रः) आनन्दप्रदोऽस्ति। अथ च (ओजिष्ठः) ओजस्व्यस्ति। भवान् (अध्वरे) यज्ञे (मंहयद्रयिः) धनानि ददन् (पवस्व) रक्षयतु ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, you are the spirit and constant stream of love, life and beauty of the life and flux of existence, sustaining integrative power, joyous and most vigorous in the cosmic yajna of love free from violence, hate and destruction. Flow on, O sustaining stream, pure, purifying and sanctifying life, giving showers of wealth, honour and excellence of life in bliss.