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मृ॒जन्ति॑ त्वा॒ सम॒ग्रुवोऽव्ये॑ जी॒रावधि॒ ष्वणि॑ । रे॒भो यद॒ज्यसे॒ वने॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
mṛjanti tvā sam agruvo vye jīrāv adhi ṣvaṇi | rebho yad ajyase vane ||
पद पाठ
मृ॒जन्ति॑ । त्वा॒ । सम् । अ॒ग्रुवः॑ । अव्ये॑ । जी॒रौ । अधि॑ । स्वनि॑ । रे॒भः । यत् । अ॒ज्यसे॑ । वने॑ ॥ ९.६६.९
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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:66» मन्त्र:9
| अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:8» मन्त्र:4
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:9
आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश ! (रेभः) शब्दगम्य (अव्ये) पालक (अधिष्वणि) शब्दगम्य (जीरौ) शत्रुनाशक (वने) भजनीय (त्वा) आपको (अग्रुवः) कर्मयोगी जन (यत्) जब (सम्मृजन्ति) ध्यानविषय करते हैं, तब आप (अज्यसे) उनके साक्षात्कार के विषय होते हैं ॥९॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में सर्वरक्षक परमात्मा के साक्षात्कार का वर्णन किया गया है कि कर्मयोगी लोग अपने कर्मण्यतायोग से परमात्मपरायण होकर परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं ॥९॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'अव्य जीरु अधिश्वण्' हृदय
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अग्रुवः) = आगे बढ़ने की प्रवृत्तिवाले लोग (त्वा) = तुझे (संमृजन्ति) = सम्यक् शुद्ध करते हैं। वे यह समझते हैं कि सारी उन्नति इस सोमरक्षण पर ही निर्भर करती है। इस सोम का रक्षण उस हृदय के होने पर करते हैं जो (अव्ये) = [अव रक्षणे] उत्तमता से रक्षित हुआ है, जिसे वासनाओं के आक्रमण से बचाया गया है। जिसमें (जीरौ) = पाप-वासनाओं को जीर्ण किया गया है, जो हृदय पापों का अभिभव करनेवाला हुआ है। तथा (अधिष्वणि) = जो हृदय खूब ही उस प्रभु के स्वनवाला हुआ है, जिसमें प्रभु के नामों का उच्चारण हो रहा है। वस्तुतः हृदय के ऐसा होने पर ही सोम का रक्षण होता है । [२] इस सोम का रक्षण तभी होता है (यत्) = जबकि (रेभः) = प्रभु के नामों का उच्चारण करता हुआ तू (वने) = सम्भजन में (अज्यसे) = गतिवाला होता है । निरन्तर प्रभु की उपासना ही वस्तुतः सोमरक्षण का साधन बनती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण का मुख्य साधन 'निरन्तर प्रभु-स्तवन व आगे बढ़ने की वृत्ति का होना' है।
आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (रेभः) शब्दगम्यं (अव्ये) पालकं (अधिष्वणि) शब्दगमनीयं (जीरौ) शत्रुघातकं (वने) भजनीयं (त्वा) भवन्तं (अग्रुवः) कर्मयोगिनः (यत्) यदा (सम्मृजन्ति) ध्यानविषयं कुर्वन्ति, तदा (अज्यसे) त्वं तेषां साक्षात्कृतो भवसि ॥९॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - When the mind is transparent, consciousness flows in self-concentration, and the presence of divinity vibrates vocal and voluble, advanced yogis with seven sense-prana priests exalt you in higher language of the Veda.
