वांछित मन्त्र चुनें

परि॒ धामा॑नि॒ यानि॑ ते॒ त्वं सो॑मासि वि॒श्वत॑: । पव॑मान ऋ॒तुभि॑: कवे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pari dhāmāni yāni te tvaṁ somāsi viśvataḥ | pavamāna ṛtubhiḥ kave ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि॑ । धामा॑नि । यानि॑ । ते॒ । त्वम् । सो॒म॒ । अ॒सि॒ । वि॒श्वतः॑ । पव॑मान । ऋ॒तुऽभिः॑ । क॒वे॒ ॥ ९.६६.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:66» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:7» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कवे) हे सर्वज्ञ परमात्मन् ! (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले ! आप (ऋतुभिः) वसन्त आदि ऋतुओं के परिवर्तन से संसार में नये-नये भाव उत्पन्न करते हैं और (यानि ते) जो तुम्हारे (धामानि) लोक-लोकान्तर (परि) सब ओर हैं, उनको (विश्वतः) सब प्रकार से (त्वं सोमासि) आप उत्पन्न करनेवाले हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय तीनों प्रकार की क्रियाओं का हेतु है। अर्थात् उसी से संसार की उत्पत्ति और उसी में स्थिति और उसी से प्रलय होता है ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पवमान कवि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सोम) = हे सोम ! (यानि) = जो (ते) = तेरे (धामानि) = तेज (परि) = शरीर में चारों ओर हैं, उनके द्वारा हे सोम ! तू (विश्वतः असि) = चारों ओर फैला हुआ है । [२] हे (पवमान) = पवित्र करनेवाले, (कवे) = शान्तप्रज्ञ - बुद्धि को सूक्ष्म बनानेवाले सोम ! तू (ऋतुभिः) = [ऋ गतौ] नियमित गतियों के द्वारा शरीर में पवित्रता व बुद्धि दीप्ति को करनेवाला है। सोमरक्षक पुरुष जीवन की गतियों में बड़ा व्यवस्थित होता है । यह नियमितता उसे पवित्र व दीप्त बुद्धिवाला बनाती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम शरीर में व्याप्त सोम के तेजों से पवित्र व दीप्त बुद्धि बनें।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कवे) हे सर्वज्ञ जगदीश्वर ! (पवमान) सर्वपवित्रकर्तः ! भवान् (ऋतुभिः) वसन्ताद्यृतूनां परिवर्तनेन नव्यान् भावानुत्पादयति। अथ च (यानि ते) यानि तव (धामानि) लोकलोकान्तराणि (परि) परितस्सन्ति तानि (विश्वतः) सर्वथा (त्वं सोमासि) त्वमुत्पादकोऽसि ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, you are the light, power and peace of all regions of the world, your domain wherein and whereon you pervade, pure and purifying, and reflect and rule by the law and order of the time and seasons of nature.