पव॑मानो र॒थीत॑मः शु॒भ्रेभि॑: शु॒भ्रश॑स्तमः । हरि॑श्चन्द्रो म॒रुद्ग॑णः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
pavamāno rathītamaḥ śubhrebhiḥ śubhraśastamaḥ | hariścandro marudgaṇaḥ ||
पद पाठ
पव॑मानः । र॒थिऽत॑मः । शु॒भ्रेभिः॑ । शु॒भ्रशः॑ऽतमः । हरि॑ऽचन्द्रः । म॒रुत्ऽग॑णः ॥ ९.६६.२६
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:66» मन्त्र:26
| अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:12» मन्त्र:1
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:26
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (पवमानः) पवित्र करनेवाला तथा (रथीतमः) गतिशील परमात्मा (शुभ्रेभिः) अपनी ज्योति से (शुभ्रशस्तमः) सर्वोपरि प्रकाशक है। ऐसा ईश्वर (हरिश्चन्द्रः) सबको आनन्द देनेवाले (मरुद्गणः) विद्वानों का एकमात्र उपास्य है ॥२६॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव परमात्मा की उपासना करते हैं, किसी अन्य की नहीं ॥२६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'जीवन की शुभ्रता का साधक' सोम
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पवमानः) = यह पवित्र करनेवाला सोम (रथीतमः) = अतिशयेन उत्तम शरीर-रथवाला है। यह शरीररथ को निर्दोष दृढ़ व प्रकाशमय बनाता है। यह (शुभ्रेभिः शुभ्रशस्तमः) = निर्मल गुणों व दीप्तियों से खूब ही निर्मल व दीप्तिवाला है। [२] (हरिः) = सब दुःखों का हरण करनेवाला है। (चन्द्रः) = आह्लाद को पैदा करनेवाला है। तथा (मरुद्गणः) = प्राणों के गणवाला है । सोमरक्षण से ही तो सम्पूर्ण प्राणशक्ति की वृद्धि होती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमारे जीवन को शुभ्र बनाता है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (पवमानः) पविता (रथीतमः) गतिशीलः परमेश्वरः (शुभ्रेभिः) स्वीयप्रकाशेन (शुभ्रशस्तमः) अतिप्रकाशकोऽस्ति। एतादृशो जगदीश्वरः (हरिश्चन्द्रः) सर्वानन्ददाता (मरुद्गणः) विद्वद्भिरुपासनीयोऽस्ति ॥२६॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Pure and purifying, supreme master of the cosmic chariot and its controller, most refulgent with its light and powers, destroyer of want and suffering, commander and controller of all cosmic powers and forces in action, such is Soma.
