स म॑र्मृजा॒न आ॒युभि॒: प्रय॑स्वा॒न्प्रय॑से हि॒तः । इन्दु॒रत्यो॑ विचक्ष॒णः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
sa marmṛjāna āyubhiḥ prayasvān prayase hitaḥ | indur atyo vicakṣaṇaḥ ||
पद पाठ
सः । म॒र्मृ॒जा॒नः । आ॒युऽभिः॑ । प्रय॑स्वान् । प्रय॑से । हि॒तः । इन्दुः॑ । अत्यः॑ । वि॒ऽच॒क्ष॒णः ॥ ९.६६.२३
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:66» मन्त्र:23
| अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:11» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:23
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दुः) परमैश्वर्यसंपन्न परमात्मा (हितः) सबका हितकारक तथा (अत्यः) सतत गमनशील है और (विचक्षणः) सर्वज्ञ (प्रयस्वान्) तर्पक (सः) वह जगदीश (प्रयसे) ब्रह्मानन्द के लिए (आयुभिः) कर्मयोगियों से (मर्मृजानः) ध्यान किया गया उनके साक्षात्कार को प्राप्त होता है ॥
भावार्थभाषाः - योगी लोग जब परमात्मा का ध्यान करते हैं, तब परमात्मा उन्हें आत्मस्वरूपवत् भान होता है। इसी अभिप्राय से योगसूत्र में कहा है कि “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” समाधिवेला में उपासक के स्वरूप में परमात्मा की स्थिति होती है ॥२३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
इन्दुः अत्यो विचक्षणः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह (आयुभिः) = गतिशील पुरुषों से (मर्मृजान:) = शुद्ध किया जाता हुआ (इन्दुः) = हमें शक्तिशाली बनानेवाला सोम प्रयस्वान् सात्त्विक अन्नवाला होता है। सात्त्विक अन्न के सेवन से उत्पन्न हुआ हुआ सोम ही (प्रयसे) = प्रकृष्ट उद्योग के लिये (हितः) = हितकर होता है। यह सात्त्विक अन्न से उत्पन्न सोम हमें सात्त्विक कार्यों में प्रवृत्त करता है। [२] (अत्यः) = यह सोम सततगामी अश्व की तरह होता है। हमें शक्तिशाली बनाकर निरन्तर क्रिया में प्रवृत्त करता है । (विचक्षणः) = यह विशिष्ट द्रष्टा होता है। हमारी ज्ञानाग्नि को दीप्त करके यह हमें वस्तुतत्त्वों का दर्शन कराता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- गतिशील बने रहकर हम सोम को पवित्र कर पाते हैं। यह हमें प्रकृष्ट उद्योग में प्रवृत्त करता है। हमें शक्तिशाली, गतिशील व तत्त्वद्रष्टा बनाता है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दुः) परमैश्वर्ययुक्तः परमात्मा (हितः) हितकारकोऽस्ति। तथा (अत्यः) सर्वदा गत्वरोऽस्ति। अथ च (विचक्षणः) सर्वज्ञोऽस्ति (प्रयस्वान्) तर्पकः स परमेश्वरः (प्रयसे) ब्रह्मानन्दाय (आयुभिः) कर्मयोगिभिः (मर्मृजानः) ध्यायमानः सन् तेषां साक्षात्कृतो भवति ॥२३॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Soma is invoked, adored and exalted by humanity, by all living beings indeed. Cosmic high priest offering libations into the creative evolution, generous giver, it is invoked and worshipped for the gifts of life for peace and progress. Refulgent and blissful, it comes and blesses the supplicant, for it watches all, responds, and reveals the mysteries of existence.
