यस्य॒ वर्णं॑ मधु॒श्चुतं॒ हरिं॑ हि॒न्वन्त्यद्रि॑भिः । इन्दु॒मिन्द्रा॑य पी॒तये॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yasya varṇam madhuścutaṁ hariṁ hinvanty adribhiḥ | indum indrāya pītaye ||
पद पाठ
यस्य॑ । वर्ण॑म् । म॒धु॒ऽश्चुत॑म् । हरि॑म् । हि॒न्वन्ति॑ । अद्रि॑ऽभिः । इन्दु॑म् । इन्द्रा॑य । पी॒तये॑ ॥ ९.६५.८
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:65» मन्त्र:8
| अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:2» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:8
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) जिस परमात्मा का (वर्णं) स्वरूप (मधुश्चुतं) आनन्द देनेवाला है, उस (हरिं) पाप को हरण करनेवाले (इन्दुम्) स्वतःप्रकाश परमात्मा को (अद्रिभिः) चित्तवृत्तियों द्वारा (हिन्वन्ति) उपासक लोग ध्यान का विषय बनाते हैं। (इन्द्राय) कर्मयोगी की (पीतये) तृप्ति के लिये इसी प्रकार की उपासना उचित समझनी चाहिये, अन्य नहीं ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो लोग अपनी चित्तवृत्तियों को निरोध करके परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं, वे ही कर्मयोगी कहला सकते हैं, अन्य नहीं ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वर्ण- मधुश्चुत्-हरि
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यस्य) = जिस सोम के (वर्णम्) = शत्रु नाशक, (मधुश्चतम्) = माधुर्य को क्षरित करनेवाले (हरिम्) = दुःखों के हरणकर्ता रस को (अद्रिभिः) = प्रभु की उपासनाओं के द्वारा [ adore अद्रि] (हिन्वन्ति) = अपने में प्रेरित करते हैं। उस (इन्दुम्) = सोम को हम (इन्द्राय) = परमैश्वर्यशाली प्रभु की प्राप्ति के लिये और (पीतये) = अपने रक्षण के लिये धारण करें। [२] शरीर में सुरक्षित सोम सब रोगों का वारक है [वर्ण] जीवन को मधुर बनानेवाला है [मधुश्चुतम् ] सब कष्टों का हरण करनेवाला है [हरि] । इस सोम के रक्षण से ही हम प्रभु को प्राप्त करते हैं और अपना रक्षण कर पाते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम 'वर्ण- मधुश्श्रुत्-हरि' है। इसका धारण ही प्रभु प्राप्ति व नीरोगता का साधन है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) यस्य परमात्मनः (वर्णं) स्वरूपम् (मधुश्चुतं) आनन्ददायकं वर्तते तं (हरिं) पापहर्तारं (इन्दुम्) स्वतःप्रकाशं परमात्मानं (अद्रिभिः) चित्तवृत्त्या (हिन्वन्ति) उपासका ध्यानविषयं कुर्वन्ति। (इन्द्राय) कर्मयोगिनः (पीतये) तृप्तये एतादृश्युपासना कर्तव्या नान्या ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Whose essential being and existential identity, honeyed sweet of infinite kindness, destroyer of want and suffering, devotees adore, exalt and move with holy songs and yajnic actions for the satisfaction and beatification of the soul.
