राजा॑ मे॒धाभि॑रीयते॒ पव॑मानो म॒नावधि॑ । अ॒न्तरि॑क्षेण॒ यात॑वे ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
rājā medhābhir īyate pavamāno manāv adhi | antarikṣeṇa yātave ||
पद पाठ
राजा॑ । मे॒धाभिः॑ । ई॒य॒ते॒ । पव॑मानः । म॒नौ । अधि॑ । अ॒न्तरि॑क्षेण । यात॑वे ॥ ९.६५.१६
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:65» मन्त्र:16
| अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:4» मन्त्र:1
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:16
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (राजा) परमात्मा (मेधाभिः) बुद्धि से (ईयते) प्राप्त होता है, (पवमानः) सबको पवित्र करनेवाला है, (मनावधि) यज्ञों में पवित्रता देनेवाला है तथा (अन्तरिक्षेण यातवे) परलोकयात्रा में सहायक है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इत्यादि सब यज्ञों में परमात्मा ही यज्ञदेव है और यज्ञ को पवित्र करनेवाला है तथा परलोकयात्रा में जीव का एकमात्र सहारा परमात्मा ही है। उक्त गुणसम्पन्न परमात्मा की उपासना एकमात्र संस्कृत बुद्धि द्वारा ही करनी चाहिये ॥१६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मेधा - पवित्रता - मध्यमार्ग
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (राजा) = हमारे जीवन का रञ्जन करनेवाला यह सोम 'राजा प्रकृतिरञ्जनात्' (मेधाभिः) = मेधा बुद्धियों के साथ (ईयते) = हमारे अन्दर गतिवाला होता है । यह सोम (मनौ अधि) = विचारशील पुरुष में (पवमानः) = पवित्रता को करनेवाला है। सोम 'राजा' है, यही हमारे जीवनों में आनन्द व उल्लास [रञ्जन] का कारण बनता है। सुरक्षित हुआ हुआ यह हमें मेधाबुद्धि से युक्त करता है। तथा हमारे जीवनों को पवित्र करता है। [२] यह सोम 'अन्तरिक्षेण यातवे'- सदा मध्यमार्ग से चलने के लिये होता है । सोमरक्षण से मनुष्य की प्रवृत्ति, अति को छोड़कर, युक्ताहार-विहारवाली व युक्तचेष्ट बनती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से 'बुद्धि पवित्रता व मध्यमार्ग से चलने की वृत्ति' प्राप्त होती है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (राजा) राजते प्रकाशत इति राजा सर्वप्रकाशकः परमात्मा (मेधाभिः) बुद्धिभिः (ईयते) प्राप्यते। परमात्मा (पवमानः) सर्वपवितास्ति। तथा (मनावधि) यज्ञेषु पवित्रतासम्पादकोऽस्ति। (अन्तरिक्षेण यातवे) अथ च परलोकयात्रायां सहायकोऽस्ति ॥१६॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Refulgent Soma, divine spirit of power and peace, pure, purifying and vibrant, is attained through intelligential communion in meditation for reaching the higher stages of existence into the middle sphere between the earth and the highest regions of bliss.
