यस्य॑ ते॒ मद्यं॒ रसं॑ ती॒व्रं दु॒हन्त्यद्रि॑भिः । स प॑वस्वाभिमाति॒हा ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yasya te madyaṁ rasaṁ tīvraṁ duhanty adribhiḥ | sa pavasvābhimātihā ||
पद पाठ
यस्य॑ । ते॒ । मद्य॑म् । रस॑म् । ती॒व्रम् । दु॒हन्ति॑ । अद्रि॑ऽभिः । सः । प॒व॒स्व॒ । अ॒भि॒मा॒ति॒ऽहा ॥ ९.६५.१५
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:65» मन्त्र:15
| अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:3» मन्त्र:5
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:15
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) जिस (ते) आपके (मद्यं) आह्लादकारक (तीव्रम्) उत्कट (रसं) रस को कर्मयोगी लोग (अद्रिभिः) उद्योगरूप शक्तियों से (दुहन्ति) पूर्णरूप से दुहते हैं, (सः) वह (अभिमातिहा) विघ्नों के हनन करनेवाले आप (पवस्व) हमको पवित्र करें ॥१५॥
भावार्थभाषाः - कर्मयोगियों के सब विघ्नों को हनन करनेवाला परमात्मा उनके उद्योग को सफल करता है ॥१५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'अभिमातिहा' सोम
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यस्य ते) जिस तेरे (मद्यम्) = आनन्द को देनेवाले (रसम्) = रस को (अद्रिभिः) = उपासनाओं के द्वारा (तीव्रं दुहन्ति) = खूब ही शीघ्रता से अपने में पूरित करते हैं [दुह प्रपूरणे ] । (सः) = वह तू (अभिमातिहा) = अभिमान आदि सब शत्रुओं का विनाश करनेवाला होकर (पवस्व) = हमें प्राप्त हो । [२] प्रभु की उपासना हमें वासनाओं की ओर झुकने से बचाती है। परिणामतः सोम का शरीर में ही रक्षण होता है। यही 'अद्रियों' से सोम का दोहन है। दुग्ध सोम आनन्द व उल्लास का कारण बनता है। शरीर में सुरक्षित यह सोम सब अभिमान आदि अध्यात्म शत्रुओं का विनाश करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - उपासना से सोम का रक्षण होता है । रक्षित सोम अभिमान आदि शत्रुओं को विनष्ट करता है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) यस्य (ते) तव (मद्यं) आह्लादनीयं (तीव्रम्) उत्कटं (रसं) रसं कर्मयोगिनः (अद्रिभिः) उद्योगकर्तृशक्तिभिः (दुहन्ति) पूर्णतया दुहते। (सः) सः (अभिमातिहा) विघ्नविनाशको भवान् (पवस्व) अस्मान् पवित्रयतु ॥१५॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Whose exciting nectar, sharp and exalting in experience, devoted supplicants distil from meditation on life, that same Soma, lord of power and purity, destroyer of negativities, adversaries and enemies, we pray, may come, save and bless us with peace, purity and security.
