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हि॒न्वन्ति॒ सूर॒मुस्र॑य॒: स्वसा॑रो जा॒मय॒स्पति॑म् । म॒हामिन्दुं॑ मही॒युव॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

hinvanti sūram usrayaḥ svasāro jāmayas patim | mahām indum mahīyuvaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हि॒न्वन्ति॑ । सूर॑म् । उस्र॑यः । स्वसा॑रः । जा॒मयः॑ । पति॑म् । म॒हाम् । इन्दु॑म् । म॒ही॒युवः॑ ॥ ९.६५.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:65» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:1» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब परमात्मा का ध्यानविषयत्व निरूपण करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (पतिम्) जो सबका रक्षक है तथा (महामिन्दुं) सर्वोपरि जो सर्वप्रकाशक हैं (सूरम्) ऐसे परमात्मा को (स्वसारः) बुद्धिवृत्तियें (जामयः) ज्ञानरूप बुद्धिवृत्तियें (उस्रयः) परमात्मा को विषय करनेवाली (महीयुवः) ब्रह्मविषयणी उक्त प्रकार की वृत्तियें (हिन्वन्ति) साक्षात्कार करती हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करता है कि हे जीवो ! तुम जगज्जन्मादिहेतुभूत महाशक्ति को विषय करनेवाली संस्कृत बुद्धियों को उत्पन्न करो, ताकि इन्द्रियागोचर उस सूक्ष्मशक्ति का तुम ध्यान द्वारा साक्षात्कार कर सको ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उस्त्रि-स्वसा-जामि-महीयु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उस्त्रयः) = [उस्र - going] गतिशील, (स्व-सारः) = आत्मतत्त्व की ओर चलनेवाले, (जामयः) = अपने में सद्गुणों को जन्म देनेवाले लोग (सूरम्) = शक्ति-संचार द्वारा कर्मों में प्रेरित करनेवाले (पतिम्) = रोगकृमि विनाश द्वारा हमारा रक्षण करनेवाले सोम को (हिन्वन्ति) = शरीर में ही प्रेरित करते हैं। [२] (महीयुवः) = महनीय शरीर को अपने साथ जोड़ने की कामनावाले लोग (महाम्) = इस महान् (इन्दुम्) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम को अपने अन्दर प्रेरित करते हैं। इस सोम के द्वारा ही शरीर शक्तिशाली बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम का रक्षण करनेवाले 'उस्रि, स्वसृ, जामि व महीयु' होते हैं, गतिशील, आत्मतत्त्व की ओर चलनेवाले, सद्गुणों का विकास करनेवाले, महनीय शरीर की कामनावाले ।
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आर्यमुनि

अथ परमात्मनो ध्यानविषयत्वं निरूप्यते ।

पदार्थान्वयभाषाः - (पतिम्) सर्वरक्षकं तथा (महामिन्दुं) अतिप्रकाशकं (सूरम्) सुवति प्रेरयति कर्मणि लोकमिति सूरः परमात्मा तं जगदीश्वरं (स्वसारः) स्वयं सरन्तीति स्वसारो बुद्धिवृत्तयः तथा (जामयः) जायन्त्यविद्यां नाशयन्तीति जामयो ज्ञानरूपा बुद्धिवृत्तयः (उस्रयः) परमात्मविषयिण्यः (महीयुवः) ब्रह्मविषयिण्यो वृत्तयः (हिन्वन्ति) परमात्मनः साक्षात्कारं कुर्वन्ति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Just as lights of the dawn like loving sisters fore- run and herald and exalt the sun, so do the senses, mind and intelligence together in service of the great soul reveal the power and presence of the supreme lord of the universe, blissful father sustainer of existence.