पु॒ना॒न इ॑न्दवेषां॒ पुरु॑हूत॒ जना॑नाम् । प्रि॒यः स॑मु॒द्रमा वि॑श ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
punāna indav eṣām puruhūta janānām | priyaḥ samudram ā viśa ||
पद पाठ
पु॒ना॒नः । इ॒न्दो॒ इति॑ । ए॒षा॒म् । पुरु॑ऽहूत । जना॑नाम् । प्रि॒यः । स॒मु॒द्रम् । आ । वि॒श॒ ॥ ९.६४.२७
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:64» मन्त्र:27
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:41» मन्त्र:2
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:27
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (पुनानः) हे सबको पवित्र करनेवाले ! (पुरुहूत) सर्वपूज्य ! (इन्दो) सर्वप्रकाशक (प्रियः) सबके प्रिय परमात्मन् ! (एषां जनानाम्) इन उपासक पुरुषों के (समुद्रम्) द्रवीभूत अन्तःकरण को (आविश) अपनी अभिव्यक्ति से शुद्ध करिये ॥२
भावार्थभाषाः - जो लोग विद्या और विनय से सम्पन्न हैं, उनके अन्तःकरण को परमात्मा अवश्यमेव पवित्र करता है ॥२७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
समुद्र - प्रवेश
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पुरुहूत) = बहुतों से पुकारे जानेवाले (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! (पुनानः) = पवित्र करता हुआ तू (एषां जनानाम्) = इन लोगों का (प्रियः) = प्रीति को करनेवाला है । सोम के लिये सभी आराधना करते हैं, यह हमें शक्ति देता है, हमारे लिये प्रीतिकर होता है। [२] हे सोम ! तू (समुद्रम्) = उस आनन्दमय प्रभु में (आविश) = प्रवेश करनेवाला हो । अन्ततः यह सुरक्षित सोम हमें प्रभु के समीप प्राप्त कराता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमारे लिये प्रीतिकर होता है, हमारा प्रभु से मेल कराता है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (पुनानः) सर्वपावकपरमात्मन् ! (पुरुहूत) जगत्पूज्य ! (इन्दो) सर्वप्रकाशक ! (प्रियः) सर्वप्रियपरमात्मन् ! (एषां जनानाम्) उपासकानां पुरुषाणां (समुद्रम्) द्रवीभूतमन्तःकरणं (आविश) स्वाभिव्यक्त्या शुद्धं कुरु ॥२७॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Indu, pure, purifying dearest presence invoked by all, bless the sacred heart of all these people, the heart that is deep as the ocean of love and faith.
