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तं त्वा॒ विप्रा॑ वचो॒विद॒: परि॑ ष्कृण्वन्ति वे॒धस॑: । सं त्वा॑ मृजन्त्या॒यव॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

taṁ tvā viprā vacovidaḥ pari ṣkṛṇvanti vedhasaḥ | saṁ tvā mṛjanty āyavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम् । त्वा॒ । विप्राः॑ । व॒चः॒ऽविदः॑ । परि॑ । कृ॒ण्व॒न्ति॒ । वे॒धसः॑ । सम् । त्वा॒ । मृ॒ज॒न्ति॒ । आ॒यवः॑ ॥ ९.६४.२३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:64» मन्त्र:23 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:40» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:23


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (तं त्वा) उक्त गुणसम्पन्न आपको (वचोविदो विप्राः) वेदवाणी जाननेवाले मेधावी लोग (परिष्कृण्वन्ति) वर्णन करते हैं और (वेधस आयवः) कर्मकाण्डी लोग (त्वा) आपको (संमृजन्ति) ध्यानविषय करते हैं ॥२३॥
भावार्थभाषाः - जो लोग कर्मयोगी हैं तथा योगसाधनरूपी कर्मों द्वारा परमात्मा को अपने ध्यान का विषय बनाते हैं, वे परमात्मा के साक्षात्कार को प्राप्त होते हैं, अन्य नहीं ॥२३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कौन सोम को शुद्ध करते हैं ?

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! (तं त्वा) = उस तुझ को (विप्राः) = अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाले (वचोविदः) = स्तुति वचनों को जाननेवाले (वेधसः) = उत्तम कर्मों के निर्माता पुरुष परिष्कृण्वन्ति परिष्कृत करते हैं। ये लोग इस सोम को वासनाओं से मलिन नहीं होने देते। [२] हे सोम ! (त्वा) = तुझे (आयवः) = ये गतिशील पुरुष संमृजन्ति सम्यक् शुद्ध करते हैं। गतिशीलता हमें विषय-वासनाओं में फँसने नहीं देती । इस प्रकार सोम शुद्ध बना रहता है |
भावार्थभाषाः - भावार्थ–‘विप्र-वचोविद्- वेधस्- आयु' सोम का रक्षण कर पाते हैं।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश्वर ! (तं त्वा) उक्तगुणसम्पन्नं त्वां (वचोविदः) वेदज्ञाः (विप्राः) मेधाविनः (परिष्कृण्वन्ति) वर्णयन्ति। अथ च (वेधस आयवः) कर्मकाण्डिनो जनाः (त्वा) त्वां (सम्मृजन्ति) ध्यानविषयं कुर्वन्ति ॥२३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, lord of purity, joy and power of the world, wise sages and the Vedic voice adore, exalt and glorify you, and the people of knowledge concentrate on you as the sole object of meditation.