वांछित मन्त्र चुनें

अ॒भि वे॒ना अ॑नूष॒तेय॑क्षन्ति॒ प्रचे॑तसः । मज्ज॒न्त्यवि॑चेतसः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi venā anūṣateyakṣanti pracetasaḥ | majjanty avicetasaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । वे॒नाः । अ॒नू॒ष॒त॒ । इय॑क्षन्ति । प्रऽचे॑तसः । मज्ज॑न्ति । अवि॑ऽचेतसः ॥ ९.६४.२१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:64» मन्त्र:21 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:40» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:21


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रचेतसो वेनाः) प्रकृष्ट ज्ञानवाले विज्ञानी लोग (अभ्यनूषत) परमात्मा की उपासना करते हैं और (इयक्षन्ति) उपासनात्मक यज्ञ से परमात्मा का यजन करते हैं। (अविचेतसः) अज्ञानी लोग (मज्जन्ति) डूबते हैं ॥२१॥
भावार्थभाषाः - जो लोग शुद्ध मनवाले हैं, वे परमात्मा के तत्त्वज्ञान से मुक्ति के भागी होते हैं और अज्ञानी लोग बार-बार जन्म लेते हैं और मरते हैं, परन्तु फिर भी परमात्मा के तत्त्व को नहीं पाते। इसीलिये उनका यहाँ डूबना दिखलाया है ॥२१॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'प्रचेताः, न कि अविचेताः ' बनें

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वेना:) = कान्त स्तुतिमय जीवनवाले पुरुष (अभि) = दिन के दोनों ओर प्रातः सायं अनूषत उस प्रभु का स्तवन करते हैं। यह स्तवन ही उन्हें वासनाओं से बचाता है । [२] (प्रचेतसः) = प्रकृष्ट ज्ञानवाले समझदार पुरुष (इयक्षन्ति) = यज्ञों को करने की कामनावाले होते हैं । सदा यज्ञों में प्रवृत्त रहकर ये विषयों के ध्यान से दूर रहते हैं । [३] पर (अविचेतसः) = नासमझ लोग न स्तवन करते हैं, नां ही यज्ञों को करने की कामनावाले होते हैं। अतः ये भोगों में फँसकर वीर्य नाश करते हुए संसार सागर में (मज्जन्ति) = डूब जाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु-स्तवन व यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्ति हमें भोगों में फँसने से बचाती है ।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रचेतसो वेनाः) अत्युत्कृष्टज्ञानवन्तो विज्ञानिनो जनाः (अभ्यनूषत) जगदीश्वरस्योपासनां कुर्वन्ति। अथ च (इयक्षन्ति) उपासनात्मकयज्ञेन परमात्मयजनं कुर्वन्ति। तथा (अविचेतसः) अज्ञानिनः (मज्जन्ति) निमग्ना भवन्ति ॥२१॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Enlightened sages adore, exalt and join the divine infinity of bliss while the ignorant get drowned in the existential ocean they fail to cross.