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वृष्ण॑स्ते॒ वृष्ण्यं॒ शवो॒ वृषा॒ वनं॒ वृषा॒ मद॑: । स॒त्यं वृ॑ष॒न्वृषेद॑सि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vṛṣṇas te vṛṣṇyaṁ śavo vṛṣā vanaṁ vṛṣā madaḥ | satyaṁ vṛṣan vṛṣed asi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वृष्णः॑ । ते॒ । वृष्ण्य॑म् । शवः॑ । वृषा॑ । वन॑म् । वृषा॑ । मदः॑ । स॒त्यम् । वृ॒ष॒न् । वृषा॑ । इत् । अ॒सि॒ ॥ ९.६४.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:64» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:36» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (वृष्णः) वर्षणशील (ते) आपका (मदः) आनन्द (वृषा) वर्षक है। तथा (ते) तुम्हारा (शवः) बल (वृष्ण्यं) वर्षणशील है और तुम्हारा (वृषा) वर्षणशील (सत्यं) सत्यस्वरूप (वनम्) भजन करने योग्य है और एकमात्र (वृषन्) वर्षक आप ही (असि) उपासना करने योग्य हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में एकमात्र परमात्मा को उपास्यरूप से वर्णन किया गया है। तात्पर्य यह है कि ईश्वर से भिन्न सत्यादि गुणों का धाम अन्य कोई पदार्थ नहीं है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सुख-वर्षक' सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! (वृष्णः) = सब सुखों के वर्षक (ते) = तेरा (शवः) = बल (वृष्ण्यम्) = सुखवर्षकों में सर्वोत्तम है । (वनम्) = तेरा सम्भजन, तेरा सेवन (वृषा) = हमें शक्तिशाली बनाकर हमारे लिये सुखवर्षक है । (मदः) = तेरे रक्षण से उत्पन्न उल्लास (वृषा) = हमारे लिये सुखद है। [२] (सत्यम्) = सचमुच, हे (वृषन्) = सुखवर्षक सोम ! (इत्) = निश्चय से (वृषा असि) = तू सुखवर्षक है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण द्वारा हम अपने जीवनों को सुखी करें।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषन्) हे अभीष्टदायक परमात्मन् ! (वृष्णः) वर्षणशीलस्य (ते) तव (मदः) आनन्दः (वृषा) वर्षकः (शवः) बलं च (वृष्ण्यम्) वर्षणशीलं वर्तते। अथ च तव (वृषा) वर्षणशीलं (सत्यम्) सत्यस्वरूपं (वनम्) भजनीयमस्ति। तथा एकः (वृषेत्) वर्षको भवानेव (असि) उपासनीयोऽस्ति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Generous as you are, your strength rains in showers, generous is your plenitude, generous is the bliss of your joy and ecstasy. Eternal truth, shower of generosity, you are the ultimate generous giver of the joy of life.