ऊ॒र्मिर्यस्ते॑ प॒वित्र॒ आ दे॑वा॒वीः प॒र्यक्ष॑रत् । सीद॑न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
ūrmir yas te pavitra ā devāvīḥ paryakṣarat | sīdann ṛtasya yonim ā ||
पद पाठ
ऊ॒र्मिः । यः । ते॒ । प॒वित्रे॑ । आ । द॒व॒ऽअ॒वीः । प॒रि॒ऽअक्ष॑रत् । सीद॑न् । ऋ॒तस्य॑ । योनि॑म् । आ ॥ ९.६४.११
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:64» मन्त्र:11
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:38» मन्त्र:1
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:11
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - हे दिव्यस्वरूप परमात्मन् ! (ते) तुम्हारे आनन्द की (ऊर्मिः) लहरें (यः) जो (देवावीः) दिव्य हैं, वे (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरणों में (पर्यरक्षत्) सब ओर से बहती हैं। आप (ऋतस्य) सचाई के (योनिमासीदन्) धाम में निवास करते हैं ॥११॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुषों के हृदयों को अपनी सुधामयी वृष्टि से सिञ्चित कर देता है ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ऋत की योनि में स्थित होना
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! (यः) = जो (ते) = तेरी (ऊर्मिः) = तरंग (पवित्रे) = पवित्र हृदयवाले पुरुष में (आ देवावी:) = समन्तात् दिव्य गुणों की कामनावाली होती हुई पर्यक्षरत् प्राप्त होती है, वह ऋतस्य योनिम् ऋत के उत्पत्ति स्थान प्रभु में (आसीदन्) = निवासवाली होती है। [२] सुरक्षित सोम हमारे जीवनों में दिव्य गुणों को उत्पन्न करता है और अन्ततः हमें प्रभु को प्राप्त कराता है। ये प्रभु ही ऋत के उत्पत्ति- स्थान हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से दिव्य गुणों को प्राप्त करते हुए हम प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनें ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - हे विश्वकर्तः परमात्मन् ! (ते) तवानन्दाय (ऊर्मिः) तरङ्गाः (यः) ये (देवावीः) दिव्यास्ते (पवित्रे) पूतान्तःकरणेषु (पर्यक्षरत्) परितः प्रवहन्ति। भवान् (ऋतस्य) सत्यतायाः (योनिमासीदन्) स्थाने निवसति ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - The light divine that is yours, most heavenly, radiates blissfully in the pious heart and soul, abiding in the seat of its own law of eternal truth.
