इन्दु॑: पविष्ट॒ चेत॑नः प्रि॒यः क॑वी॒नां म॒ती । सृ॒जदश्वं॑ र॒थीरि॑व ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
induḥ paviṣṭa cetanaḥ priyaḥ kavīnām matī | sṛjad aśvaṁ rathīr iva ||
पद पाठ
इन्दुः॑ । प॒वि॒ष्ट॒ । चेत॑नः । प्रि॒यः । क॒वी॒नाम् । म॒ती । सृ॒जत् । अश्व॑म् । र॒थीःऽइ॑व ॥ ९.६४.१०
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:64» मन्त्र:10
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:37» मन्त्र:5
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:10
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दुः) परमात्मा स्वतःप्रकाश है। (पविष्ट) सबको पवित्र करनेवाला है (चेतनः) चिद्रूप है (कवीनां प्रियः) विद्वानों का प्रिय है। (मती) बुद्धिरूप है (अश्वम्) सर्वोपरि विद्युदादि शक्तियों को (सृजत्) रचा है और वह परमात्मा (रथीरिव) महारथी के समान तेजस्वी होकर विराजमान है ॥१०॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा को चेतनस्वरूप वर्णन करने के लिये चेतन शब्द स्पष्ट आया है। जो लोग यह कहा करते हैं कि वेद में परमात्मा को ज्ञानस्वरूप कहनेवाले शब्द नहीं आते, उनको इस मन्त्र से शिक्षा लेनी चाहिये ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
इन्दुः- चेतन:- प्रियः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्दुः) = हमें शक्तिशाली बनानेवाला सोम (पविष्ट) = हमें प्राप्त हो । (चेतन:) = यह हमारे में चेतना को पैदा करनेवाला है। (प्रियः) = प्रीति को, मनःप्रसाद को उत्पन्न करनेवाला है । [२] यह (कवीनां मती) = ज्ञानियों की स्तुति के द्वारा (अश्वम्) = इन्द्रियाश्वों को (सृजत्) = शरीर रथ में युक्त करता है [Put on ] । उसी प्रकार (इव) = जैसे कि (रथी:) = एक रथी घोड़े को रथ में जोतता है । सोमरक्षण से मनुष्य सतत क्रियाशील बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम शरीर में शक्ति को [इन्दु] मस्तिष्क में चेतना को [चेतनः] तथा हृदय में प्रसन्नता को [प्रियः] प्राप्त कराता है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दुः) परमात्मा स्वयं प्रकाशशीलोऽस्ति। (पविष्ट) सर्वपवित्रकर्ता चास्ति। (चेतनः) अथ च चिद्रूपोऽस्ति (कवीनां प्रियः) विद्वज्जनानां प्रियः (मती) बुद्धिस्वरूपोऽस्ति (अश्वम्) सर्वोत्कृष्टविद्युदादिशक्तीः (सृजत्) अरचयत्। अथ च स परमात्मा (रथीरिव) महारथ इव तेजस्वी तिष्ठति ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Soma, lord of bliss, is self-refulgent and holy, purest and most purifying, omniscient, dearest love of the poets and celebrants, and wisest of the wise. Creating the dynamic world of matter, energy and mind, he abides like the master of the universal chariot.
