पव॑स्व देवायु॒षगिन्द्रं॑ गच्छतु ते॒ मद॑: । वा॒युमा रो॑ह॒ धर्म॑णा ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
pavasva devāyuṣag indraṁ gacchatu te madaḥ | vāyum ā roha dharmaṇā ||
पद पाठ
पव॑स्व । दे॒व॒ । आ॒यु॒षक् । इन्द्र॑म् । ग॒च्छ॒तु॒ । ते॒ । मदः॑ । वा॒युम् । आ । रो॒ह॒ । धर्म॑णा ॥ ९.६३.२२
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:63» मन्त्र:22
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:34» मन्त्र:2
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:22
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (देव) हे दिव्यगुणसम्पन्न परमात्मन् ! आप मुझको (पवस्व) पवित्र करें। (ते) आपका (मदः) परम आनन्द (आयुषक्) उपासक (इन्द्रम्) कर्मयोगी पुरुष को (गच्छतु) प्राप्त हो। तथा आप (वायुं) ज्ञानयोगी पुरुष को (धर्मणा) उपास्य भाव से (आरोह) प्राप्त हों ॥२२॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष ज्ञानयोगी वा कर्मयोगी बनकर परमात्मा के उपासक बनते हैं, परमात्मा उन्हें तद्धर्मतापत्ति योग द्वारा पवित्र करता है अर्थात् अपने शिष्यादिभावों को प्रदान करके उनको शुद्ध करता है ॥२२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वायुं आरोह धर्मणा
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (देव) = दिव्य गुणों को जन्म देनेवाले सोम ! तू (आयुषक्) = [अनुषक्तं] निरन्तर हमें (पवस्व) = प्राप्त हो (ते मदः) = तेरा उल्लास, तेरे रक्षण से उत्पन्न उल्लास (इन्द्रं गच्छतु) = इस जितेन्द्रिय पुरुष को प्राप्त हो । [२] हे सोम ! तू (धर्मणा) = अपनी धारण शक्ति के द्वारा (वायं आरोह) = आरोहण करता हुआ निरन्तर गतिशील प्रभु को [वा गतौ] प्राप्त हो। यह सोम हमारे जीवन में पवित्रता का सञ्चार करता हुआ हमें प्रभु की ओर ले जानेवाला हो। 'वायु' नाम से प्रभु का स्मरण करता हुआ यह सोमरक्षक पुरुष भी निरन्तर गतिशील बनता हुआ अपने जीवन को अधिकाधिक पवित्र करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सोमरक्षण द्वारा पवित्र व उल्लासमय जीवनवाले बनकर प्रभु को प्राप्त हों ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (देव) हे परमैश्वर्यसम्पन्नपरमात्मन् ! भवान् मां (पवस्व) पवित्रयतु (ते) भवतः (मदः) आनन्दः (आयुषक्) उपासकं (इन्द्रम्) कर्मयोगिनं (गच्छतु) प्राप्नोतु। तथा भवान् (वायुम्) ज्ञानयोगिनं पुरुषं (धर्मणा) उपास्यभावेन (आरोह) प्राप्नोतु ॥२२॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, self-refulgent and self-joyous lord of peace and bliss, let your presence vibrate and purify us. Let your ecstatic bliss reach Indra, the ruler, for the glory of mankind. May you with your divine power and presence emerge and rise in the heart of vibrant devotees.
