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वृष॑णं धी॒भिर॒प्तुरं॒ सोम॑मृ॒तस्य॒ धार॑या । म॒ती विप्रा॒: सम॑स्वरन् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vṛṣaṇaṁ dhībhir apturaṁ somam ṛtasya dhārayā | matī viprāḥ sam asvaran ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वृष॑णम् । धी॒भिः । अ॒प्ऽतुर॑म् । सोम॑म् । ऋ॒तस्य॑ । धार॑या । म॒ती । विप्राः॑ । सम् । अ॒स्व॒र॒न् ॥ ९.६३.२१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:63» मन्त्र:21 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:34» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:21


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विप्राः) मेधावीजन (वृषणं) कामनाओं की वृष्टि करानेवाले (सोमम्) परमात्मा को (धीभिः) शुद्धबुद्धि द्वारा (मती) स्तुति से तथा (ऋतस्य धारया) सत्य की धारणा से (समस्वरन्) बुद्धिविषय करते हैं ॥२१॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र से परमात्मा के साक्षात्कार करने का उपदेश किया है ॥२१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वृषणं अप्तुरम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विप्राः) = अपना पूरण करनेवाले ज्ञानी लोग (ऋतस्य धारया) = ऋत के, जो भी ठीक है उसके धारण के हेतु से (मती) = मननपूर्वक (सोमं समस्वरन्) = सोम का स्तवन करते हैं, सोम के गुणों का उच्चारण करते हैं । [२] उस सोम के गुणों का उच्चारण करते हैं, जो कि (वृषणम्) = हमें शक्तिशाली बनानेवाला है तथा (धीभिः अप्तुरम्) = बुद्धियों के साथ कर्मों को हमारे में प्रेरित करनेवाला है । सोमरक्षण से हम शक्तिसाली बनते हैं । यह सुरक्षित सोम हमें ज्ञानपूर्वक कर्मोंवाला बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम के गुणों का स्मरण करते हुए हम इसके रक्षण के द्वारा शक्तिशाली व कर्मशील बनते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विप्राः) बुद्धिमन्तः पुरुषाः (वृषणम्) कामनावर्षकं (सोमम्) परमात्मानं (धीभिः) शुद्धबुद्ध्या (मती) स्तुत्या तथा (ऋतस्य धारया) सत्यधारणतया (समस्वरन्) बुद्धिविषयं कुर्वन्ति ॥२१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Vibrant poets, sages and scholars, with their thoughts, holy actions and spontaneous songs of truth and sincerity, celebrate Soma, generous giver, brave warrior and instant conqueror.