तमी॑ मृजन्त्या॒यवो॒ हरिं॑ न॒दीषु॑ वा॒जिन॑म् । इन्दु॒मिन्द्रा॑य मत्स॒रम् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
tam ī mṛjanty āyavo hariṁ nadīṣu vājinam | indum indrāya matsaram ||
पद पाठ
तम् । ई॒म् इति॑ । मृ॒ज॒न्ति॒ । आ॒यवः॑ । हरि॑म् । न॒दीषु॑ । वा॒जिन॑म् । इन्दु॑म् । इन्द्रा॑य । म॒त्स॒रम् ॥ ९.६३.१७
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:63» मन्त्र:17
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:33» मन्त्र:2
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:17
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (तं हरिं) उक्त गुणसम्पन्न परमात्मा को, (इन्दुम्) जो सबको अपने प्रेम से आर्द्रित करनेवाला है और (इन्द्राय मत्सरं) कर्मयोगी के लिये आह्लाद को उत्पन्न करनेवाला है (ईं वाजिनम्) बलस्वरूप को समृद्धियों में (नदीषु) सम्पूर्ण अभ्युदयों में (आयवः) मनुष्य लोग (मृजन्ति) अविद्या के परदे को हटाकर बुद्धिविषय बनाते हैं ॥१७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो लोग आवरण को दूर करके परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं, वे सब प्रकार के अभ्युदयों को प्राप्त होते हैं ॥१७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
नदीषु वाजिनम्
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (आयवः) = गतिशील पुरुष (तम्) = उस सोम को (ईम्) = निश्चय से (मृजन्ति) = शुद्ध करते हैं, इसे वासनाओं से मलिन नहीं होने देते। जो सोम (हरिम्) = सब दुःखों का हरण करनेवाला है। जो (नदीषु) = शरीर की सब नाड़ियों में [रक्तवाहिनी धमनियों में] (वाजिनम्) = शक्ति का सञ्चार करनेवाला है । इसके नाश से सारा नाड़ी संस्थान दुर्बल पड़ जाता है। [२] उस सोम का शोधन करते हैं, जो कि (इन्दुम्) = शक्ति का संचार करनेवाला है तथा (इन्द्राय मत्सरम्) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये आनन्द का संञ्चार करनेवाला है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- गतिशीलता से वासनाओं के आक्रमण के न होने से सोम पवित्र बना रहता है । यह रोगहर्ता, नाड़ियों को सशक्त बनानेवाला व आनन्द का दाता है।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (तं हरिम्) पूर्वोक्तगुणसम्पन्नं (इन्दुम्) स्वप्रेम्णार्द्रकारकम् अथ च (इन्द्राय मत्सरं) कर्मयोगिनामाह्लादकारकं (ईम् वाजिनम्) समृद्धिषु बलस्वरूपं तथा (नदीषु) समस्ताभ्युदयेषु (आयवः) मनुष्याः (मृजन्ति) अविद्यास्वरूपवनिकामुत्पाट्य बुद्धिविषयं कुर्वन्ति ॥१७॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - That shower of soma, sparkling brilliant, most exhilarating, destroyer of suffering and pain, seeping in the heart and flowing in the streams of life, the yajakas exalt and adore for the glory of life.
