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ए॒ते धामा॒न्यार्या॑ शु॒क्रा ऋ॒तस्य॒ धार॑या । वाजं॒ गोम॑न्तमक्षरन् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ete dhāmāny āryā śukrā ṛtasya dhārayā | vājaṁ gomantam akṣaran ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒ते । धामा॑नि । आर्या॑ । शु॒क्राः । ऋ॒तस्य॑ । धार॑या । वाज॑म् । गोऽम॑न्तम् । अ॒क्ष॒र॒न् ॥ ९.६३.१४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:63» मन्त्र:14 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:32» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:14


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एते शुक्राः) पूर्वोक्त शीलस्वभाव परमेश्वर, जो (ऋतस्य धारया) सच्चाई की धाराओं से (वाजम्) बल को और (गोमन्तं) ऐश्वर्य को (अक्षरन्) बरसाते हैं, वे (आर्या) आर्य पुरुषों के (धामानि) स्थान समझने चाहिये ॥१४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करता है कि श्रेष्ठ पुरुषों की स्थिति का हेतु एकमात्र शुभस्वभाव वा शील ही समझना चाहिये। अर्थात् शुभशील से उनकी दृढ़ता और उनका आर्यत्व बना रहता है, इसलिये शील को सम्पादन करना आर्यों का परम कर्तव्य है ॥१४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गोमान् वाज

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एते) = ये (शुक्राः) = जीवन को शुचि व शक्तिशाली बनानेवाले सोम (ऋतस्य धारया) = [धारा=वाड्नामसु] सत्य वेदज्ञान की वाणी से (आर्या धामानि) = श्रेष्ठ तेजों को (अक्षरन्) = हमारे में क्षरित करते हैं। ये सोमकण ज्ञानाग्नि को दीप्त करके हमें श्रेष्ठ तेजों से युक्त करते हैं । [२] (गोमन्तं वाजम्) = प्रशस्त इन्द्रियोंवाले [गाव: इन्द्रियाणि] बल को ये हमारे में क्षरित करते हैं। हमें ये पवित्र व बल-सम्पन्न बनाते हैं। सुरक्षित सोम से शरीर ही नीरोग नहीं होता, मन भी इससे निर्मल बनता है । एवं यह सोम हमें पवित्र तो बनाता ही है। यह हमें शक्तिशाली भी बनाता है । पवित्र व वासनाओं से अनाक्रान्त जीवनवाला पुरुष शक्ति के रक्षण से बल-सम्पन्न तो होता ही है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें वेदज्ञान के अनुसार चलाता हुआ पवित्र व शक्ति सम्पन्न बनाता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (एते शुक्राः) प्रागुक्तशीलस्वभावः परमेश्वरः यः (ऋतस्य धारया) सत्यधाराभिः (वाजम्) बलं तथा (गोमन्तम्) ऐश्वर्यं (अक्षरन्) वर्षयते स ईश्वरः (आर्या) आर्यपुरुषाणां (धामानि) स्थानरूपोऽवगन्तव्यः ॥१४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - These, showers of soma, divine creative power, great and dynamic, pure and powerful, rain down on earth in streams of life sap and motherly process of natural law, giving the milk of nourishment and vibrant fulfilment to all forms of existence.