सोमो॑ दे॒वो न सूर्योऽद्रि॑भिः पवते सु॒तः । दधा॑नः क॒लशे॒ रस॑म् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
somo devo na sūryo dribhiḥ pavate sutaḥ | dadhānaḥ kalaśe rasam ||
पद पाठ
सोमः॑ । दे॒वः । न । सूर्यः॑ । अद्रि॑ऽभिः । प॒व॒ते॒ । सु॒तः । दधा॑नः । क॒लशे॑ । रस॑म् ॥ ९.६३.१३
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:63» मन्त्र:13
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:32» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:13
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) सब संसार को उत्पन्न करनेवाला (देवः) दिव्यस्वरूप (सूर्यः न) सूर्य के समान (अद्रिभिः) अपनी शक्तियों से (पवते) पवित्र करता है और (सुतः) स्वतःसिद्ध परमात्मा जो (कळशे) प्रत्येक पदार्थ में (रसं) रस को (दधानः) धारण कराता है ॥१३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मदेव ही प्रत्येक पदार्थ रस को उत्पन्न करता है और वही अपनी शक्तियों से सबको पवित्र करता है ॥१३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रकाश - पवित्रता - मधुरता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सोमः) = शरीर में उत्पन्न होनेवाला सोम (सूर्यः देवः न) = सूर्य देव के समान है। सूर्योदय होता है और सारा अन्धकार विनष्ट हो जाता है। इसी प्रकार हमारे जीवन-गणना में भी सोमरक्षण के द्वारा ज्ञान-सूर्य का उदय होता है और सब अज्ञानान्धकार विलुप्त हो जाता है। [२] (अद्रिभिः) = उपासकों से [ adore ] (सुतः) = उत्पन्न किया गया यह सोम (पवते) = जीवन को पवित्र करता है । यह सोम (कलशे) = सोलह कलाओं के निवास स्थानभूत इस शरीर में (रसं दधानः) = रस को धारण करता है। शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ यह जीवन को रसमय [मधुर] बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम [१] अज्ञानान्धकार को नष्ट करता है, [२] जीवन को पवित्र बनाता है, [३] इसमें मधुरता को भरता है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) सूते चराचरं जगदिति सोमः समस्तविश्वविधाता (देवः) दिव्यगुणसम्पन्न ईश्वरः (सूर्यः न) सूर्य इव (अद्रिभिः) स्वकीयशक्तिभिः (पवते) पवित्रयति। तथा यः (सुतः) स्वयंसिद्धः परमात्मा (कलशे) अखिलपदार्थेषु (रसम्) आनन्दं (दधानः) धारयति ॥१३॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Soma, self-existent divine power of creativity, radiates, energises and purifies all like the generous refulgent sun vesting the sap of life in every form of existence.
