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परी॒तो वा॒यवे॑ सु॒तं गिर॒ इन्द्रा॑य मत्स॒रम् । अव्यो॒ वारे॑षु सिञ्चत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

parīto vāyave sutaṁ gira indrāya matsaram | avyo vāreṣu siñcata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि॑ । इ॒तः । वा॒यवे॑ । सु॒तम् । गिरः॑ । इन्द्रा॑य । म॒त्स॒रम् । अव्यः॑ । वारे॑षु । सि॒ञ्च॒त॒ ॥ ९.६३.१०

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:63» मन्त्र:10 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:31» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:10


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (गिरः) हे स्तोता लोगों ! आप (इन्द्राय) कर्मयोगी के लिये और (वायवे) ज्ञानयोगी के लिये (इतः) इस कर्मभूमि में (मत्सरं) आह्लादजनक (सुतं) शील की वृष्टि करें और (वारेषु) सब वरणीय पदार्थों में (अव्यः) रक्षा की (परिषिञ्चत) सब ओर से वृष्टि करें ॥१०॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करता है कि जो वेदवेत्ता लोग ज्ञानयोग तथा कर्मयोग का उपदेश करते हैं, वे मानों अमृत की वृष्टि से अकर्मण्यतारूप मृत्यु से मृत लोगों का पुनरुज्जीवन करते हैं ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'वायवे इन्द्राय' मत्सरम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सुतम्) = उत्पन्न हुए हुए सोम को (इतः) = इस उत्पत्ति-स्थान से (गिरः) = हे स्तोताओ ! (परि सिञ्चत) = शरीर में चारों ओर सिक्त करो। शरीर के अंग-प्रत्यंग को यह शक्तिशाली बनानेवाला हो। [२] उस सोम को तुम सिक्त करो, जो कि (वायवे) = गतिशील पुरुष के लिये तथा (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (मत्सरम्) = आनन्द के सञ्चार को करनेवाला है। इसलिए तुम इसे सिक्त करो कि यह (अव्यः वारेषु) = [अवेः] रक्षक पुरुष के रोगादि के निवारण का निमित्त बनाता है । हम इसका रक्षण करते हैं। यह हमें रोगों वा मानसविकारों से बचाता है। गतिशीलता व जितेन्द्रियता ही इस सोमरक्षण के साधन है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- गतिशील व जितेन्द्रिय बनकर हम सोम का रक्षण करते हैं। यह रक्षित सोम हमारे जीवन में उल्लास का कारण बनता है और सब निवारण के योग्य चीजों को हमारे से दूर रखता
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (गिरः) हे स्तोतारो जनाः ! भवन्तः (इन्द्राय) कर्मयोगिने तथा (वायवे) ज्ञानयोगिने (इतः) कर्मभूमौ (मत्सरं सुतम्) आह्लादजनकं शीलं वर्षयन्तु। तथा (वारेषु) समस्तवरणीयपदार्थेषु (अव्यः परिषिञ्चत) परितो रक्षावृष्टिं कुर्वन्तु ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

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