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त्वमि॑न्दो॒ परि॑ स्रव॒ स्वादि॑ष्ठो॒ अङ्गि॑रोभ्यः । व॒रि॒वो॒विद्घृ॒तं पय॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
tvam indo pari srava svādiṣṭho aṅgirobhyaḥ | varivovid ghṛtam payaḥ ||
पद पाठ
त्वम् । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ । स्वादि॑ष्ठः । अङ्गि॑रःऽभ्यः । व॒रि॒वः॒ऽवित् । घृ॒तम् । पयः॑ ॥ ९.६२.९
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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:62» मन्त्र:9
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:25» मन्त्र:4
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:9
आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे तेजस्विन् ! (त्वम्) आप (स्वादिष्ठः) परमप्रिय हैं और (वरिवोविद्) सब प्रजाओं के धनों के प्रापयिता हैं (अङ्गिरोभ्यः) आप विद्वानों के लिये (घृतम् पयः) घृत-दुग्धादि पदार्थ (परिस्रव) उत्पन्न करिये ॥९॥
भावार्थभाषाः - प्रजाओं को चाहिये कि वे सदैव अपने राजपुरुषों से ऐश्वर्य की प्रार्थना करके संसार में ऐश्वर्य बढ़ाने का यत्न करें ॥९॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
घृतं पयः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! (त्वम्) = तू (अंगिरोभ्यः) = तेरे रक्षण के द्वारा अंग-प्रत्यंग को रसमय बनानेवालों के लिये (स्वादिष्ठः) = जीवन को अतिशयेन आनन्दयुक्त करनेवाला है । [२] (वरिवः वित्) = सब वरणीय धनों का प्राप्त करानेवाला तू (घृतम्) = [घृ दीसौ] ज्ञान की दीप्ति को तथा (पयः) = [ओप्यायी वृद्धौ] शक्ति की वृद्धि को (परिस्रव) = प्राप्त करा। शरीर में सुरक्षित हुआ- हुआ सोम ज्ञानाग्नि को दीप्त करके ज्ञानवृद्धि का कारण बनता है और शरीर को नीरोग बनाकर अंग-प्रत्यंग की शक्ति को बढ़ाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम 'ज्ञान व शक्ति' का वर्धन करके जीवन को मधुर बनाता है ।
आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे तेजस्विन् ! (त्वम्) भवान् (स्वादिष्ठः) परमप्रियोऽस्ति अथ च (वरिवोवित्) सर्वप्रजानां धनप्रापकोऽस्ति। (अङ्गिरोभ्यः) भवान् विद्वद्भ्यः (घृतम् पयः) घृतदुग्धादिपदार्थान् (परिस्रव) उत्पादयतु ॥९॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, dynamic spirit of action, joy and glory of life, harbinger of the best of wealth and honour, flow sweet and most delicious for vibrant sages and scholars and release streams of milk and ghrta for humanity.
