अ॒यं विच॑र्षणिर्हि॒तः पव॑मान॒: स चे॑तति । हि॒न्वा॒न आप्यं॑ बृ॒हत् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
ayaṁ vicarṣaṇir hitaḥ pavamānaḥ sa cetati | hinvāna āpyam bṛhat ||
पद पाठ
अ॒यम् । विऽच॑र्षणिः । हि॒तः । पव॑मानः । सः । चे॒त॒ति॒ । हि॒न्वा॒नः । आप्य॑म् । बृ॒हत् ॥ ९.६२.१०
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:62» मन्त्र:10
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:25» मन्त्र:5
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:10
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सः अयम्) यह सेनापति (विचर्षणिः) प्रजाओं को विशेषरूप से देखनेवाला (हितः) और सबका हितकारक (पवमानः) दुष्टों को दण्ड द्वारा शुद्ध करता हुआ (बृहत् आप्यं हिन्वानः) बहुत से भोग्य पदार्थों को उत्पन्न कराता हुआ (चेतति) सर्वथा जाग्रदवस्था से विराजमान हैं ॥१०॥
भावार्थभाषाः - जो सेनापति अपने कर्म में तत्पर रहता है अर्थात् राजधर्म का यथाविधि पालन करता है, वह प्रजा में सब प्रकार से सुख उत्पन्न करता है ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
बृहत् आप्यम्
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अयम्) = यह सोम (विचर्षणिः) = विशेषरूप से हमारा द्रष्टा [= ध्यान करनेवाला] होता है। यही तो शरीर को सब रोगों से बचाता है। (हितः) = यह सदा हमारे लिये हितकर होता है । (पवमानः) = हमारे जीवन को पवित्र बनाता है । [२] (सः) = वह सोम (बृहत् आप्यम्) = सदा वृद्धि की कारणभूत [महनीय] मित्रता को, प्रभु की मित्रता को (हिन्वानः) = प्रेरित करता हुआ (चेतति) = जाना जाता है। इस सोमरक्षण के द्वारा ही हमें प्रभु की मित्रता प्राप्त होती है। यह प्रभु की मित्रता 'बृहत्' है, हमारी वृद्धि का कारण बनती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम हमें पवित्र बनाता हुआ प्रभु की मित्रता को प्राप्त कराता है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (सः अयम्) असौ सेनापतिः (विचर्षणिः) प्रजाहितदृष्टिः (हितः) तथा सर्वहितकारकः (पवमानः) दुष्टान् दण्डेन शोधयन् (बृहत् आप्यं हिन्वानः) अनेकविधभोज्यपदार्थमुत्पादयन् (चेतति) सर्वथा जागरणावस्थया विराजते ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - This Soma, divine spirit of action, honour and joy, is all watching, all beneficent, all inspiring, moving and dynamic, ever wakeful, setting in motion the flow on for attainment of vast achievable success and fulfilment.
