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स नो॒ भगा॑य वा॒यवे॑ पू॒ष्णे प॑वस्व॒ मधु॑मान् । चारु॑र्मि॒त्रे वरु॑णे च ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa no bhagāya vāyave pūṣṇe pavasva madhumān | cārur mitre varuṇe ca ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । नः॒ । भगा॑य । वा॒यवे॑ । पू॒ष्णे । प॒व॒स्व॒ । मधु॑ऽमान् । चारुः॑ । मि॒त्रे । वरु॑णे । च॒ ॥ ९.६१.९

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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:61» मन्त्र:9 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:19» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:9


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मधुमान्) मधुर आनन्द के उत्पादक (चारुः) सर्वत्र गतिवाले (सः) वह आप (नः) मुझको (मित्रे) और उचित कर्म करनेवाले को तथा (वरुणे) जो सत्कार करने योग्य है, उसको (भगाय) ऐश्वर्य (वायवे) सुन्दर गति (पूष्णे) तथा पुष्टि प्राप्त होने के लिये (पवस्व) सोद्योग होवें ॥९॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा से उद्योग की प्रार्थना की गई है। परमात्मा की परमकृपा से ही पुरुष उद्योगी बनकर परम ऐश्वर्य को प्राप्त होता है ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'भग-वायु-पूषा'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = हे सोम ! वह तू (नः) = हमारे लिये (भगाय) = ऐश्वर्य के लिये [ज्ञानैश्वर्य की प्राप्ति के लिये] (वायवे) = [वा गतौ] क्रियाशीलता के लिये तथा (पूष्णे) = शरीर के उचित पोषण के लिये (पवस्व) = प्राप्त हो । तू (मधुमान्) = हमारे जीवन में माधुर्य को उत्पन्न करनेवाला हो । [२] तू (मित्रे) = स्नेह की वृत्तिवाले पुरुष में (च) = और (वरुणे) = द्वेष के निवारण करनेवाले पुरुष में (चारु:) = सुन्दर है । वस्तुतः ईर्ष्या-द्वेष-क्रोध की भावनाओं के साथ सोम के रक्षण का सम्भव नहीं रहता। ये वासनायें सोम को मलिन कर देती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम राग-द्वेष से दूर रहकर सोम को पवित्र रखें। यह सोम हमारे जीवन में 'ज्ञानैश्वर्य, क्रियाशीलता व पोषण' को प्राप्त करायेगा ।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मधुमान्) मधुरानन्दोत्पादकः (चारुः) सर्वत्र गतिशीलः (सः) स भवान् (नः) मह्यं (मित्रे) उचितकर्मकर्त्रे तथा (वरुणे) यः सत्कारार्हस्तस्मै (भगाय) ऐश्वर्याय (वायवे) सुन्दरगतये च (पूष्णे) तथा पुष्टिप्राप्तये (पवस्व) उद्योगसहितो भवतु ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, beautiful, blissful, honey spirit of the sweets of existence, flow free and purifying for the glory of life, for vibrant forces, for the power of health and growth, and for the friendly and discriminative people among humanity.