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परि॑ णो॒ अश्व॑मश्व॒विद्गोम॑दिन्दो॒ हिर॑ण्यवत् । क्षरा॑ सह॒स्रिणी॒रिष॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pari ṇo aśvam aśvavid gomad indo hiraṇyavat | kṣarā sahasriṇīr iṣaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि॑ । नः॒ । अश्व॑म् । अ॒श्व॒ऽवित् । गोऽम॑त् । इ॒न्दो॒ इति॑ । हिर॑ण्यऽवत् । क्षरा॑ । स॒ह॒स्रिणीः । इषः॑ ॥ ९.६१.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:61» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:18» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे कर्मयोगिन् ! (अश्ववित्) अश्वादिकों से युक्त आप (नः) हमारे लिये (परि) सब ओर से अपने कर्मयोग द्वारा (अश्वमत् गोमत् हिरण्यवत्) अश्व गो हिरण्यादि युक्त (सहस्रिणीः) अनेक प्रकार के ऐश्वर्यों को (क्षर) उत्पन्न करिये ॥३॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में कर्म्मयोगियों के द्वारा अनन्त प्रकार के ऐश्वर्यों की उपलब्धि का वर्णन किया गया है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'गोमत् हिरण्यवत्' अश्व

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्ववित्) = उत्तम इन्द्रियों के प्राप्त करानेवाले (इन्दो) = सोम ! तू (नः) = हमारे लिये (गोमत्) = प्रशस्त ज्ञान की वाणियोंवाली, (हिरण्यवत्) = [हिरण्यं = वीर्यम्] शक्ति - सम्पन्न (अश्वम्) = इन्द्रियाश्वों को (परिक्षर) = प्राप्त करा । सोमरक्षण से हमें वे उत्तम इन्द्रियाँ प्राप्त हों, जो कि ज्ञान व शक्ति से युक्त हों । ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान का प्राप्त करानेवाली हों, तो कर्मेन्द्रियाँ सशक्त हों। [२] हे सोम ! इस प्रकार हमारी इन्द्रियों को ठीक बनाकर (सहस्रिणीः इषः) = शतशः ज्ञानों को देनेवाली प्रेरणाओं को प्राप्त करा । सोमरक्षण से शुद्ध हृदय में हमें प्रभु की प्रेरणायें सुन पड़ें। ये प्रेरणायें हमारे लिये ज्ञान के प्रकाश को देनेवाली हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण हमें 'ज्ञान व शक्ति' से युक्त इन्द्रियों को प्राप्त करायें। तथा हम अन्तःस्थित प्रभु की प्रेरणाओं को सुननेवाले बनें ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे कर्मयोगिन् ! (अश्ववित्) अश्वादिभिर्युतो भवान् (नः) अस्मभ्यं (परि) सर्वतः स्वकर्मद्वारेण (अश्वमत् गोमत् हिरण्यवत्) घोटकगोहिरण्यादियुतान् (सहस्रिणीः इषः) बहुविधैश्वर्यान् (क्षर) उत्पादयतु ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And for us, let abundant streams of food, energy and wealth of a thousandfold riches and variety flow abounding in horses, transport and progress, lands, cows and beauties of culture and literature, gold and golden graces. O creator, ruler and controller of peace and joy, you know the values and dynamics of evolution and progress.