सम्मि॑श्लो अरु॒षो भ॑व सूप॒स्थाभि॒र्न धे॒नुभि॑: । सीद॑ञ्छ्ये॒नो न योनि॒मा ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
sammiślo aruṣo bhava sūpasthābhir na dhenubhiḥ | sīdañ chyeno na yonim ā ||
पद पाठ
सम्ऽमि॑श्लः । अ॒रु॒षः । भ॒व॒ । सु॒ऽउ॒प॒स्थाभिः । न । धे॒नुऽभिः॑ । सीद॑म् । श्ये॒नः । न । योनि॑म् । आ ॥ ९.६१.२१
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:61» मन्त्र:21
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:22» मन्त्र:1
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:21
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - आप (श्येनः न योनिम् आसीदन्) विद्युत् के समान अपने स्थान में स्थित होते हुए (न) तत्काल ही युद्ध में (सूपस्थाभिः धेनुभिः सम्मिश्लः) दृढ़ स्थितिवाली इन्द्रियों से मिश्रित अर्थात् सावधान होकर (अरुषः भव) देदीप्यमान होवें ॥२१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की शक्तियें विद्युत् के समान सदैव उग्ररूप से विद्यमान रहती हैं। जो पुरुष उनके विरुद्ध करता है, उसको आत्मिक सामाजिक और शारीरिकरूप से अवश्यमेव दण्ड मिलता है ॥२१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
'अरुष' सोम
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (न) = [सं प्रति] अब, हे सोम ! (सूपस्थाभिः) = उत्तम उपस्थानवाली धेनुभिः- वेदवाणीरूप धेनुओं से (संमिश्ल:) = मिला हुआ (अरुषः भव) = आरोचमान हो । सोम ज्ञानाग्नि को दीप्त करता है । इस दीप्त ज्ञानाग्नि से हम ज्ञान की वाणियों को समझनेवाले बनते हैं। यह समझना ही वेदवाणी रूप धेनुओं का सूपस्थान है। जब हम इन वाणियों का उपस्थान करते हैं, तो सोम को शरीर में सुरक्षित करनेवाले होते हैं। इस प्रकार इन धेनुओं से मिला हुआ यह सोम आरोचमान होता है । [२] हे सोम ! तू (श्येनः न) = शंसनीय गतिवाले के समान (योनिम्) = मूल उत्पत्ति-स्थान प्रभु में (आसीदन्) = स्थित होनेवाला हो। सोम के रक्षण से हमारे सब कर्म उत्तम होते हैं, हम भी सब गति शंसनीय होती हैं। हम अन्त: प्रभु को प्राप्त होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञान की वाणियों को अपनाने से सोम शरीर में सुरक्षित होता है। यह आरोचमान होता है, हमें प्रभु में स्थित करता है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - भवान् (श्येनः न योनिम् आसीदन्) विद्युदिव स्वस्थाने तिष्ठन् (न) तत्काल एव रणे (सूपस्थाभिः धेनुभिः सम्मिश्लः) दृढस्थितिमद्भिरिन्द्रियैर्मिश्रितः “सावधानी- भूयेत्यर्थः” (अरुषः भव) देदीप्यमानो भव ॥२१॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Be bright and blazing, integrated with creative powers of growth, perception and imagination, sojourning over space and time yet resting in your seat at the centre of existence.
