पव॑मानस्य ते॒ रसो॒ मदो॑ राजन्नदुच्छु॒नः । वि वार॒मव्य॑मर्षति ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
pavamānasya te raso mado rājann aducchunaḥ | vi vāram avyam arṣati ||
पद पाठ
पव॑मानस्य । ते॒ । रसः॑ । मदः॑ । रा॒ज॒न् । अ॒दु॒च्छु॒नः । वि । वार॑म् । अव्य॑म् । अ॒र्ष॒ति॒ ॥ ९.६१.१७
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:61» मन्त्र:17
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:21» मन्त्र:2
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:17
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - हे कर्मदक्ष ! (पवमानस्य ते) सबको सुख देनेवाले आपको (रसः) पैदा किया हुआ सुख और (मदः) आह्लाद (राजन्) हे स्वामिन् ! (अदुच्छुनः) जो विघ्नकारियों से रहित है, वह (वारम् अव्यम्) जो आपका दृढ़ भक्त है, उसकी ओर (वि) विशेषरूप से (अर्षति) जाता है ॥१७॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में ईश्वर की भक्ति का उपदेश किया गया है। ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव को समझकर जो पुरुष ईश्वरपरायण होता है, उसको सब प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं ॥१७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अ-दुच्छुनः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! (पवमानस्य) = जीवन को पवित्र करनेवाले (ते) = तेरा (रसः) = रस [सार] (मदः) = उल्लास को देनेवाला है [मदकर:] । हे (राजन्) = शरीर को दीप्त करनेवाले सोम ! तेरा रस (अदुच्छुनः) = सब दुःखों को दूर करनेवाला है [शुनं सुखं]। रोगकृमि संहार के द्वारा यह जीवन को सुखी करनेवाला है । [२] यह सोम का रस (वारम्) = वासनाओं का निवारण करनेवाले (अव्यम्) = अपना रक्षण करनेवालों में उत्तम पुरुष को ही (वि अर्षति) = विशेषरूप से प्राप्त होता है । सोमरक्षण के लिये वासनाओं से ऊपर उठना आवश्यक ही है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वासनाओं से ऊपर उठकर हम सोम का रक्षण करें। सुरक्षित सोम [क] आनन्द को देनेवाला व [ख] सब दुःखों को दूर करनेवाला है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - हे कर्मकुशल ! (पवमानस्य ते) सर्वसुखदातुर्भवतः (रसः) उत्पादितं सुखम् अथ च (मदः) आनन्दः (राजन्) हे स्वामिन् ! (अदुच्छुनः) यो हि विघ्नविधातृभिः रहितोऽस्ति सः (वारम् अव्ययम्) यो भवतः दृढभक्तोऽस्ति तं (वि) विशेषरूपेण (अर्षति) गच्छति ॥१७॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, beauty, grace and joy of life, refulgent power, as you flow, pure and purifying, the pleasure you release, the ecstasy you inspire, and the peace you emanate free from negativities, radiates to the mind and soul of the loved celebrant.
