ए॒ना विश्वा॑न्य॒र्य आ द्यु॒म्नानि॒ मानु॑षाणाम् । सिषा॑सन्तो वनामहे ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
enā viśvāny arya ā dyumnāni mānuṣāṇām | siṣāsanto vanāmahe ||
पद पाठ
ए॒ना । विश्वा॑नि । अ॒र्यः । आ । द्यु॒म्नानि॑ । मानु॑षाणाम् । सिसा॑सन्तः । व॒ना॒म॒हे॒ ॥ ९.६१.११
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:61» मन्त्र:11
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:20» मन्त्र:1
| मण्डल:9» अनुवाक:3» मन्त्र:11
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (अर्यः) प्रजाओं का स्वामी (एना) अपनी क्रियाओं से (मानुषाणाम्) मनुष्यों की (विश्वा द्युम्नानि) सम्पूर्ण सम्पत्तियों का (आ) आहरण अर्थात् संचय करता है (सिषासन्तः) ऐसे स्वामी की भक्ति में तत्पर रहते हुए हम (वनामहे) उसकी प्रार्थना करते हैं ॥११॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में स्वामिभक्ति का वर्णन किया गया है। तात्पर्य्य यह है कि स्वामिभक्ति से पुरुष उच्च पदवी को प्राप्त होता है ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
संविभाग पूर्वक ऐश्वर्य का सेवन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एना) = इस सोम के द्वारा हम (अर्ये) = उस स्वामी प्रभु में स्थित होते हुए (मानुषाणाम्) = मनुष्यों के (विश्वानि) = सब (द्युम्नानि) = ऐश्वर्यों को [walth] (सिषासन्तः) = सब में विभाग की कामना करते हुए (आ वनामहे) = सर्वथा सेवित करते हैं । [२] सोमी पुरुष मनुष्यों के सब अभ्युदयों को प्राप्त करता है। इन अभ्युदयों को प्राप्त करके वह गर्ववाला नहीं हो जाता । ब्रह्मनिष्ठ बना रहता है और इन अभ्युदयों को प्रभु का ही मानना है। प्रभु के इन धनों को वह सब के साथ संविभक्त करके ही भोगता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से हम [क] ऐश्वर्यों को प्राप्त करते हैं, [ख] इन ऐश्वर्यों को प्रभु का ही मानते हैं, [ग] संविभाग पूर्वक इनका सेवन करते हैं ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (अर्यः) प्रजास्वामी (एना) स्वक्रियाभिः (मानुषाणाम्) मनुष्याणां (विश्वा द्युम्नानि) सम्पूर्णसम्पत्तीः (आ) आहरति ‘सञ्चयं करोतीति यावत्’। (सिषासन्तः) एतादृशस्य प्रभोर्भक्तौ तत्परा भवन्तो वयं (वनामहे) तस्य प्रार्थनां कुर्मः ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Soma is the lord of humanity and the earth. By virtue of him and of him, we ask and pray for all food, energy, honour and excellence for humanity, serving him and sharing all the benefits together.
