अति॒ वारा॒न्पव॑मानो असिष्यदत्क॒लशाँ॑ अ॒भि धा॑वति । इन्द्र॑स्य॒ हार्द्या॑वि॒शन् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
ati vārān pavamāno asiṣyadat kalaśām̐ abhi dhāvati | indrasya hārdy āviśan ||
पद पाठ
अति॑ । वारा॑न् । पव॑मानः । अ॒सि॒स्य॒द॒त् । क॒लशा॑न् । अ॒भि । धा॒व॒ति॒ । इन्द्र॑स्य । हार्दि॑ । आ॒ऽवि॒शन् ॥ ९.६०.३
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:60» मन्त्र:3
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:17» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! आप (इन्द्रस्य हार्दि आविशन्) विज्ञानी के हृदय में निवास करते हुए (वारान् अति पवमानः) अपने उपासकों को अत्यन्त पवित्र करते हुए (कलशान् अभि धावति) उनके अन्तःकरणों में आप प्रादुर्भूत होते हुए (असिष्यदत्) सर्वत्र अपनी स्यन्दनशील शक्तियों से पूरित हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ज्ञानप्रद होकर शुद्धान्तःकरणों में सदैव विराजमान रहता है, इसलिये परमात्मज्ञान के लिये बुद्धि का निर्मल करना अत्यावश्यक है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
कलश-धावन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पवमानः) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाला यह सोम (वारान् अति) = सब अशुभों को लाँघकर (असिष्यदत्) = हमारे शरीर में प्रवाहित होता है। वासनाओं को शिकार होने पर यह मलिन होकर विनष्ट हो जाता है। यदि इन वासनाओं को हम पार कर पाते हैं, तो सोम का भी रक्षण करनेवाले होते हैं। उस समय यह सोम हमारे शरीर में ही सुरक्षित होता है। यह सोम (कलशान्) = प्राण आदि सोलह कलाओं के आधारभूत इन शरीरों को (अभिधावति) = शरीर व मन दोनों दृष्टिकोणों से शुद्ध कर डालता है। यह सोम शरीर में व्याधियों को विनष्ट करता है, तो मानस आधियों को भी यह विनष्ट करनेवाला बनता है। [२] ये सोमकण (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के (हार्दि) = हृदय में (आविशन्) = प्रवेश करते हैं । अर्थात् एक जितेन्द्रिय पुरुष को सदा इनके रक्षण का ध्यान होता है । इनके रक्षण की भावना को जगाने के लिये ही वह गायत्र साम के द्वारा इनका गायन करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम शारीर व मानस शुद्धि का कारण बनता है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश्वर ! भवान् (इन्द्रस्य हार्दि आविशन्) विज्ञानिनां हृदये निवसन् (वारान् अति पवमानः) स्वोपासकानतिपवित्रयन् (कलशान् अभि धावति) तेषामन्तःकरणेषु स्वयं प्रादुर्भवन् (असिष्यदत्) सर्वत्र स्वस्यन्दनशीलशक्तिभिः पूरितोऽस्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Soma, lord supreme of the dynamic flow of life, giver of choicest favours, pervading and shining at the core of human heart and soul, manifests and vitalises all forms of existence.
