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तं त्वा॑ स॒हस्र॑चक्षस॒मथो॑ स॒हस्र॑भर्णसम् । अति॒ वार॑मपाविषुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

taṁ tvā sahasracakṣasam atho sahasrabharṇasam | ati vāram apāviṣuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । त्वा॒ । स॒हस्र॑ऽचक्षसम् । अथो॒ इति॑ । स॒हस्र॑ऽभर्णसम् । अति॑ । वार॑म् । अ॒पा॒वि॒षुः॒ ॥ ९.६०.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:60» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:17» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (तम् त्वा) लोकप्रसिद्ध उन आपको स्तोता लोग (अति) अत्यन्त (अपाविषुः) स्तुति द्वारा प्रकाशित करते हैं। जो आप (सहस्रचक्षसम्) अनके वेदवाक् के रचयिता हैं तथा (सहस्रभर्णसम्) सम्पूर्ण जीवों के पोषक हैं और (वारम्) भजनीय हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा की सर्वज्ञता का वर्णन किया गया है और एकमात्र उसी को उपास्यदेव वर्णन किया है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सहस्त्रचक्षस्-सहस्त्रभर्णस्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! (तम्) = उस (सहस्रचक्षसम्) = शतशः ज्ञानों के देनेवाले (त्वा) = तुझे (अति अपाविषुः) = अतिशयेन पवित्र करने का प्रयत्न करते हैं । पवित्र सोम ही शरीर में सुरक्षित रहता है । वासनाओं से मलिन होते ही यह विनष्ट हो जाता है। [२] यह सोम 'सहस्रचक्षस् ' तो है ही, अथो और (सहस्त्रभर्णसम्) = हजारों प्रकार से हमारा भरण करनेवाला है। (वारम्) = सब अशुभों का निवारण करनेवाला है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सोम को वासनाओं से मलिन न होने दें। यह सोम ही हमें शतशः ज्ञानों को प्राप्त कराता है, यही हमारा भरण करता है, हमें अशुभों से बचाता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (तम् त्वा) लोकप्रसिद्धं त्वां स्तोतारो जनाः (अति) अत्यन्तं (अपाविषुः) स्तुतिद्वारा प्रकाशितं कुर्वन्ति। यो भवान् (सहस्रचक्षसम्) अनेकवेदवाग्रचयितास्ति तथा (सहस्रभर्णसम्) सर्वेषां जीवानां पोषकः, अथ च (वारम्) भजनीयोऽस्ति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That Supreme lord most adorable, of infinite vision and voice and infinite sustenance of life and existence, extremely lovable, worthiest of choice, you internalise and sanctify in the heart and soul.