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ए॒वा पु॑ना॒न इ॑न्द्र॒युर्मदं॑ मदिष्ठ वी॒तये॑ । गुहा॑ चिद्दधिषे॒ गिर॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evā punāna indrayur madam madiṣṭha vītaye | guhā cid dadhiṣe giraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒व । पु॒ना॒नः । इ॒न्द्र॒ऽयुः । मद॑म् । म॒दि॒ष्ठ॒ । वी॒तये॑ । गुहा॑ । चि॒त् । द॒धि॒षे॒ । गिरः॑ ॥ ९.६.९

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ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:6» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:27» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:9


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (गुहा) आपने अपनी ज्ञानरूपी गुहा में (गिरः) वेदरूपी वाणियों को (दधिषे) धारण किया है (चित्) क्योंकि (इन्द्रयुः) आप ऐश्वर्य के चाहनेवाले हैं, इसलिये (वीतये) ऐश्वर्य के लिये (मदम्मदिष्ट) उनके द्वारा हमारे आनन्द को बढ़ाइये ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गुहा में ज्ञानगिराओं का स्थापन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मदिष्ठ) = अतिशयेन उल्लासजनक सोम! (एवा) = इस प्रकार (पुनानः) = हमारे जीवनों को पवित्र करता हुआ तू (इन्द्रयुः) = जितेन्द्रिय पुरुष की कामनावाला होता है। जितेन्द्रिय पुरुष को तू प्राप्त होता है और उसके जीवन में (मदं दधिषे) = उल्लास को धारण करता है । [२] तू (वीतये) = [वी=असने] अज्ञानान्धकार के ध्वंस के लिये होता है और (चित्) = निश्चय से (गुहा) = बुद्धिरूप गुहा में (गिरः दधिषे) = ज्ञान की वाणियों को धारण करता है । सोमरक्षक पुरुष की बुद्धि में इन ज्ञान की वाणियों का प्रकाश होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-रक्षित सोम हमारे जीवनों को पवित्र करता है तथा अज्ञानान्धकार को दूर करके हमारे जीवनों को ज्ञान से द्योतित करता है । अगले सूक्त के भी ऋषि देवता प्रस्तुत सूक्त के समान ही हैं। वहाँ 'असित काश्यप देवल' कहता है-

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (गुहा) भवान् स्वज्ञानमय्यां गुहायां (गिरः) वेदवाचः (दधिषे) धारयति (चित्) यतः (इन्द्रयुः) भवान् ऐश्वर्यमभिलाषायुक्तः अतः (वीतये) ऐश्वर्याय ताभिः (मदम्मदिष्ट) आनन्दं वर्द्धयतु ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lover of Indra, the soul of humanity, most joyous spirit, pure and purifying thus, exalt and edify the beauty and ecstasy of life for the peace and ultimate freedom of the soul since, after all, you hold the sacred voice of divinity in the cave of the heart.