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ध्व॒स्रयो॑: पुरु॒षन्त्यो॒रा स॒हस्रा॑णि दद्महे । तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dhvasrayoḥ puruṣantyor ā sahasrāṇi dadmahe | tarat sa mandī dhāvati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ध्व॒स्रयोः॑ । पु॒रु॒ऽसन्त्योः॑ । आ । स॒हस्रा॑णि । द॒द्म॒हे॒ । तर॑त् । सः । म॒न्दी । धा॒व॒ति॒ ॥ ९.५८.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:58» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:15» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (ध्वस्रयोः पुरुषन्त्योः) आपकी व्याप्तिशील जो ज्ञानशक्ति और कर्मशक्ति (सहस्राणि) अनेक प्रकार की हैं, उनको (आदद्महे) हम प्राप्त करें (तरत् स मन्दी धावति) आप सबको तारते हुए हर्षरूप से सर्वत्र विराजित हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की ज्ञानशक्ति और कर्मशक्ति का लाभ करके कर्मयोगी और ज्ञानयोगी अपने कर्तव्य में तत्पर रहते हैं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'ध्वस्त्र व पुरुषन्ति'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'ध्वस्र' वह पुरुष है जो कि काम-क्रोध-लोभ का विध्वंस करता है। 'पुरु+ षन्ति' वह है जो कि खूब ही दान देनेवाला है [सन्ति] । हम सोमरक्षण के द्वारा गत मन्त्र के अनुसार ज्ञानरश्मियों को प्राप्त करके देववृत्ति के बनते हैं। ये देववृत्ति के पुरुष 'ध्वस्र व पुरुषन्ति' होते हैं, वासनाओं का विध्वंस करते हैं, दान की वृत्तिवाले होते हैं। इन (ध्वस्त्रयोः पुरुषन्त्योः) = ध्वस्र व पुरुषन्ति के (सहस्त्राणि) = शतशः गुणों को (आदद्महे) = ग्रहण करते हैं। सोमरक्षण से हम 'ध्वस्र व पुरुषन्ति' बन पाते हैं। [२] (सः) = वह 'ध्वस्र व पुरुषन्ति' बननेवाला पुरुष (तरत्) = सब वासनाओं व रोगों को तैरता हुआ (मन्दी) = प्रभु का उपासक बनकर (धावति) = जीवन को शुद्ध बना पाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण हमें 'वासनाओं का विध्वंस करनेवाला व दानवृत्तिवाला' बनाता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् (ध्वस्रयोः पुरुषन्त्योः) भवतो व्याप्तिशीला या ज्ञानशक्तिस्तथा कर्मशक्तिश्च (सहस्राणि) अनेकप्रकारिकास्ति, ताः (आदद्महे) प्राप्नुवाम (तरत् स मन्दी धावति) भवान् सर्वान् तारयन् हर्षरूपेण सर्वस्मिन् व्याप्तो विराजते ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let us receive a thousand gifts of the divine soma power that destroys evil and exalts humanity. Saving, delighting and fulfilling, the stream of divine bliss flows on.