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अ॒भि त्वा॒ योष॑णो॒ दश॑ जा॒रं न क॒न्या॑नूषत । मृ॒ज्यसे॑ सोम सा॒तये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi tvā yoṣaṇo daśa jāraṁ na kanyānūṣata | mṛjyase soma sātaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । त्वा॒ । योष॑णः । दश॑ । जा॒रम् । न । क॒न्या॑ । अ॒नू॒ष॒त॒ । मृ॒ज्यसे॑ । सो॒म॒ । सा॒तये॑ ॥ ९.५६.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:56» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:13» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कन्या जारम् न) जिस प्रकार दीप्ति अग्नि को प्राप्त होती है, उसी प्रकार (दश योषणः) दश इन्द्रियवृत्तियें (त्वा अभ्यनूषत) आपको स्तुति द्वारा प्राप्त होती हैं (सोम) हे परमात्मन् ! (सातये) आप इष्टप्राप्ति के लिये (मृज्यसे) ध्यानगोचर किये जाते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - संस्कारी पुरुषों की इन्द्रियवृत्तियें उसको विषय करती हैं, असंस्कारियों को नहीं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'मृज्यसे सोम सातये'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (दश योषण:) = ['यु मिश्रणामिक्षणयोः] अज्ञान व दुरित से पृथग्भूत तथा ज्ञान और भद्र से युक्त दस इन्द्रियाँ (त्वा अभि अनूषत) = हे सोम ! तेरा लक्ष्य करके स्तवन करती हैं। पवित्र इन्द्रियाँ सोम की ही महिमा का प्रतिपादन करती हैं। सोमरक्षण से ही वे सशक्त व पवित्र बनी हैं। इस प्रकार ये इन्द्रियाँ सोम का स्तवन करती हैं, (न) = जैसे कि (कन्या) = [ कन दीप्तौ] दीप्त ज्ञानवाली वेदवाणी (जारम्) = एक स्तोता को प्रशंसित करती हैं। वेद में प्रभु के स्तोता का यत्र-तत्र शंसन है ही । वेदवाणी को स्तोता प्रिय है, पवित्र इन्द्रियों को उसी प्रकार सोम प्रिय है । [२] हे (सोम) = वीर्यशक्त! तू (सातये) = सब वसुओं की प्राप्ति के लिये (मृज्यसे) = शुद्ध किया जाता है । सोम के शोधन से शरीर में निवास के लिये सब आवश्यक तत्त्व ठीक बने रहते हैं। वासनाओं का उबाल न आने देना ही सोम का शोधन है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-इन्द्रियों की पवित्रता से सोम का रक्षण होता है । वासनाओं से मलिन हुआ हुआ सोम शरीर में सब वसुओं को स्थापित करता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कन्या जारम् न) यथा दीपनमग्नेः प्रभवति तथैव (दश योषणः) दशेन्द्रियवृत्तयः (त्वा अभ्यनूषत) भवन्नुतिद्वारेण प्राप्ता भवन्ति। (सोम) हे नारायण ! (सातये) भवानिष्टप्राप्तये (मृज्यसे) ध्यानगोचरः क्रियते ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ten youthful organs of perception and volition, concentrated, directed and integrated with mind, intelligence and consciousness serve and help the soul to commune with you, Soma, like a loving maiden communing with her lover, and then, O Supersoul and master of the soul, you shine in the heart’s core for the ultimate victory and fulfilment of the devotee.