उ॒त नो॑ गो॒विद॑श्व॒वित्पव॑स्व सो॒मान्ध॑सा । म॒क्षूत॑मेभि॒रह॑भिः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
uta no govid aśvavit pavasva somāndhasā | makṣūtamebhir ahabhiḥ ||
पद पाठ
उ॒त । नः॒ । गो॒ऽवित् । अ॒श्व॒ऽवित् । पव॑स्व । सो॒म॒ । अन्ध॑सा । म॒क्षुऽत॑मेभिः । अह॑ऽभिः ॥ ९.५५.३
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:55» मन्त्र:3
| अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:12» मन्त्र:3
| मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:3
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (उत नः) जो कि हमारे लिये (गोवित् अश्ववित्) गवाश्वादि ऐश्वर्य के प्रापक आप ही हैं, इसलिये (सोम) हे परमात्मन् ! (मक्षूतमेभिः अहभिः) अति अल्पकाल ही में (अन्धसा पवस्व) सम्पूर्ण अन्नादि समृद्धि से पवित्र करिये ॥३॥
भावार्थभाषाः - सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का अधिपति एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिए उसी की उपासना और प्रार्थना करनी चाहिये ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
गोवित्- अश्ववित्
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उत) = और हे (सोम) = वीर्यशक्ते ! तू (नः) = हमारे लिये (गोवित्) = उत्कृष्ट ज्ञानेन्द्रियों को प्राप्त करानेवाला हो। (अश्ववित्) = उत्कृष्ट कर्मेन्द्रियों को प्राप्त करानेवाला हों। सुरक्षित सोम सब इन्द्रियों को सशक्त बनाता है, कर्मेन्द्रियाँ शक्ति सम्पन्न होकर यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त होती हैं और ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति में रुचिवाली होती हैं। [२] हे सोम ! तू (मक्षूतमेभिः) = [ मक्ष् To accumalating heap, collect] अधिक से अधिक संचय की कारणभूत (अहभिः) = [अह व्याप्तौ ] व्याप्तियों के द्वारा (अन्धसा) = इस सोम्य अन्न के भक्षण से तू (पवस्व) = हमें पवित्र करनेवाला हो। जिस समय हम सोम्य अन्नों का सेवन करते हैं, उस समय यह सोम शरीर में सुरक्षित होता है । रुधिर में व्याप्त होता हुआ यह सोम शरीर में संचित होता हुआ हमारे जीवनों को सब प्रकार से पवित्र करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम्य अन्न के सेवन से सोम शरीर में ही संचित व व्याप्त होता है। यह ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों को प्रशस्त बनाता है ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (उत नः) यो ह्यस्मभ्यं (गोवित् अश्ववित्) गवाद्यैश्वर्यप्रापको भवानेव, अतः (सोम) हे जगदाधार ! (मक्षूतमेभिः अहभिः) अचिरेणैव कालेन (अन्धसा पवस्व) समस्तान्नादिसमृद्ध्या पवित्रय ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - And O Soma, lord of energy, wealth and advancement, master of knowledge and progress, by the shortest time of the days ahead, bless and beatify us with food for body, mind and soul, rich in lands, cows and culture, horses, advancement and progressive power and achievement.
