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परि॑ णो दे॒ववी॑तये॒ वाजाँ॑ अर्षसि॒ गोम॑तः । पु॒ना॒न इ॑न्दविन्द्र॒युः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pari ṇo devavītaye vājām̐ arṣasi gomataḥ | punāna indav indrayuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

परि॑ । नः॒ । दे॒वऽवी॑तये । वाजा॑न् । अ॒र्ष॒सि॒ । गोऽम॑तः । पु॒ना॒नः । इ॒न्दो॒ इति॑ । इ॒न्द्र॒ऽयुः ॥ ९.५४.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:54» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:1» वर्ग:11» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:2» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे परमात्मन् ! (नः) हमको (परि पुनानः) सब ओर से पवित्र करते हुए आप (देववीतये) देवों की तृप्ति के लिये (गोमतः वाजान्) गवादि ऐश्वर्य को (अर्षसि) देते हैं (इन्द्रयुः) क्योंकि आप देवों अर्थात् दिव्यगुणसम्पन्न सत्कर्म्मियों को चाहनेवाले हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की कृपा से ही मनुष्य को दिव्य शक्तियें मिलती हैं। परमात्मा ही अपनी अपार दया से मनुष्य को देवभाव प्रदान करता है। हे देवत्व के अभिलाषी जनों ! आपको चाहिये कि आप सदैव उस दिव्यगुण परमात्मा की उपासना करते रहें ॥४॥ यह ५४ वाँ सूक्त और ११ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इन्द्रयु सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! तू (नः) = हमें (देववीतये) = दिव्यगुणों को प्राप्त कराने के लिये (गोमतः) = प्रशस्त इन्द्रियोंवाले वाजान् बलों को परि अर्षसि समन्तात् प्राप्त कराता है । 'सब इन्द्रियाँ शुद्ध हों, हम शक्ति-सम्पन्न हों' तो यही दिव्य गुणों के विकास का मार्ग है। [२] हे सोम ! (पुनानः) = हमें पवित्र करते हुए तुम (इन्द्रयुः) = उस परमैश्वर्यवाले प्रभु को हमारे साथ जोड़नेवाले हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमारे जीवन को पवित्र करता हुआ हमें प्रभु को प्राप्त कराता है । अवत्सार ही अगले सूक्त में भी कहता है-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे सर्वलोकस्वामिन् ! (नः) अस्मान् (परि पुनानः) सर्वतः पवित्रयन् भवान् (देववीतये) देवतानां तर्पणाय (गोमतः वाजान्) गवाद्यैश्वर्यान् (अर्षसि) ददाति (इन्द्रयुः) यतो भवान् दिव्यगुणयुक्तसमीचीनकर्मकुर्वतामभिलाषुकोऽस्ति ॥४॥ इति चतुःपञ्चाशत्तमं सूक्तमेकादशो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indu, spirit of peace, beauty and plenty, lover of men of knowledge and power, purifying and sanctifying the world, bring us food and energy for the body, mind and soul for the service and fulfilment of the men of brilliance and generosity.